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  • उपनिषद्युगीन संस्कृति - Upanishadyugeen Sanskrit - Motilal Banarsidass author
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उपनिषद्युगीन संस्कृति- Upanishadyugeen Sanskrit

Publisher: Nag Publishers
Language: Sanskrit, Hindi
Total Pages: 690
Available in:
Regular price Rs. 800.00 Sale price Rs. 900.00
Unit price per
Tax included.

Description

अध्यात्म और दर्शन के अद्वितीय स्रोत के तौर पर उपनिषद् वाङ्मय विश्व प्रसिद्ध हुआ है किन्तु उपनिषद्द्युगीन भारत के सांस्कृतिक पक्षों पर पहली बार उपनिषदों की मर्मज्ञ डॉ. वेदवती वैदिक ने यह सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया है। 'उपनिषद्युगीन संस्कृति' में तत्कालीन भूगोल, इतिहास, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, राज्य-व्यवस्था, परिवार, शिक्षा, कृषि, वाणिज्य, शिल्प आदि विषयों पर प्रभूत प्रकाश डाला गया है।

उपनिषद्युगीन भारत का यह विवेचन-विश्लेषण उपनिषदों पर अनेक शोधग्रंथों की रचयिता डॉ. वेदवती ने अपने तीन दशकों के गहन अनुसंधान के आधार पर किया है। यह ग्रन्थ प्राचीन भारतीय इतिहास, राजशास्त्र और समाजशास्त्र के अध्येताओं के लिए विरल संदर्भों का विपुल भण्डार है।

प्रमुख उपनिषदों के आख्यानों, अवधारणाओं, पदों और शब्दों की युक्तियुक्त व्याख्या के लिए विदुषी लेखिका ने वैदिक-संहिताओं, ब्राह्मण-ग्रंथों, स्मृतियों, सूत्र-ग्रंथों, पुराणों, रामायण-महाभारत तथा संस्कृत साहित्य का व्यापक आलोडन-विलोडन किया है। उपनिषदों के आध्यात्मिक और दार्शनिक पक्षों के साथ-साथ सांसारिक पक्षों को प्रतिपादित करनेवाले इस ग्रंथ का केन्द्रीय संदेश यही है कि श्रेयस् और प्रेयस् की संयुक्त साधना से ही निःश्रेयस का मार्ग प्रशस्त होता है।

उपनिषद् विद्या और वेदवती वैदिक एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत में बी.ए. (ऑनर्स) और एम.ए. करने के पश्चात उन्होंने 'श्वेताश्वतर उपनिषदों के भाष्यों का एक अध्ययन' विषय पर १९७७ में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उपनिषद् विद्या पर उनके निम्नलिखित ग्रन्थ प्रकाशित हुए। 'श्वेताश्वतर उपनिषद् : दार्शनिक अध्ययन', 'उपनिषदों के ऋषि', 'उपनिषद् वाङ्मय : विविध आयाम', तथा 'उपनिषद्युगीन संस्कृति' । भगवद्गीता के हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद ग्रंथ के अनेक संस्करण हो चुके हैं। 'उपनिषदों के निर्वचन' शीघ्र प्रकाश्य ।

इसके अतिरिक्त प्रतिष्ठित शोध-पत्रिकाओं, संपादित पुस्तकों और अभिनन्दन ग्रन्थों में वेद, उपनिषद्, भारतीय संस्कृति एवं पर्यावरण पर अनेक शोध-पत्र प्रकाशित । 'अखिल भारतीय प्राच्यविद्या परिषद', 'अखिल भारतीय दर्शन-परिषद्' तथा 'वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर वैदिक, स्ट्डीज' के अधिवेशनों में सक्रिय भाग एवं अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध-पत्रों की प्रस्तुति ।

अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विटजरलैंड, आस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया, त्रिनिदाद, कजाकिस्तान, थाईलैंड, सिंगापुर, मोरिशस, भूटान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, तुर्की, लेबनान आदि देशों की यात्रा।

१९८६ से दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण-परिसर में एम.ए और एम.फिल्. कक्षाओं में प्राध्यापन एवं शोध निर्देशन । 'इंण्डियन कौंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च' की सीनियर फेलो (१९८०-८३)।

१९७७ से दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी महाविद्यालय में अध्यापन तथा संप्रति श्री अरविन्द महाविद्यालय (सांध्य) में रीडर एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष ।