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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली - Nyaya Siddhant Muktavali

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली - Nyaya Siddhant Muktavali

Publisher: Motilal Banarsidass
Language: Sanskrit & Hindi
Total Pages: 267
Available in: Paperback
Regular price Rs. 300.00
Unit price per
Tax included.

Description

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली प्राचीन न्याय का ग्रन्थ होते हुये भी नव्यन्याय की जटिल प्रक्रिया से परिपूर्ण है। छात्रों की सुविधा के लिये इस जटिल ग्रन्थ की विशद व्याख्या हिन्दी में प्रकाशित की गई। न्यायसिद्धान्तमुक्तावली न केवल न्याय-वैशेषिक अपितु भारतीय-दर्शन-शास्त्र का द्वार है। उसका भारतीय दर्शन में वही स्थान है जो व्याकरण में सिद्धान्तकौमुदी का है।

न्याय-वैशेषिक का मर्म समझने के लिये यह भी आवश्यक है कि सारे भारतीय दार्शनिक सम्प्रदायों की रूपरेखा को आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाये, और न्याय-वैशेषिक के इतिहास और सिद्धान्तों का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया जाये। इसीलिये न्यायसिद्धान्तमुक्तावली की व्याख्या के साथ-साथ सामान्य रूप से भारतीय दर्शन-शास्त्र और विशेष रूप से न्याय-वैशेषिक शास्त्र की भूमिका के रूप में 'भारतीय दर्शन-शास्त्र न्याय वैशेषिक' नामक ग्रन्थ इस ग्रन्थ के लेखक द्वारा और इस ग्रन्थ के प्रकाशक द्वारा इसी ग्रन्थ के साथ प्रकाशित किया जा रहा है।

मुक्तावली के आधुनिक युरोपीय और आधुनिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुये हैं, परन्तु दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या से विहीन केवल अनुवाद मात्र इस ग्रन्थ के समझने में उतने सहायक नहीं हो सकते। हिन्दी में दो-तीन बार बहुत पहले अनुवादों के साथ-साथ कुछ व्याख्या भी प्रकाशित हुई थी; परन्तु उनमें अधिकतर 'पण्डिताऊ' ढंग का शब्द-विवेचन-मात्र था, दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन नहीं था।

यह ग्रन्थ एम० ए० श्रेणी के 1951-53 वर्ष के छात्रों को अर्पण किया गया है। यह उचित ही है क्योंकि उन्हीं के उद्देश्य से यह पुस्तक तैयार की गई थी। विश्वनाथ ने 'राजीव' नामक शिष्य के प्रति करुणायुक्त हो उसे न्याय-वैशेषिक का तत्त्व समझाने के लिये न्याय-सिद्धान्तमुक्तावली की रचना की थी, वर्तमान लेखक को भी 'राजीव' के समान अपने प्रिय छात्रों के लिये यह ग्रन्थ लिखना पड़ा। इस आशा से यह न्यायसिद्धान्तमुक्तावली की हिन्दी व्याख्या लिखी गई है।