{"product_id":"अलंकारभूषण","title":"अलंकारभूषण","description":"\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eकाव्य के परम्परागत स्वरूप के विवेचन में अलङ्कार को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। तथाकथित रस, ध्वनि, रीति, वक्रोक्ति आदि उपादान अपनी वैषयिक गम्भीरता तथा प्रौढ विवेचना से समन्वित भले ही रहे हों किन्तु अलङ्कार-तत्त्व की व्यापकता और सर्वसुगमता की समानता वे नहीं कर सकते। काव्य-शिक्षा में प्रवेश करते ही अलङ्कारों की पहली सीढ़ी मिलती है और कविता के रससिद्ध होने पर अलङ्कार सहज ही काव्य में आने लगते हैं। तभी ध्वन्यालोककार ने कहा है- 'अपृथग्यत्न-निर्वर्त्यः सोऽलङ्कारो ध्वनेर्मतः' (ध्वन्यालोक 2.16)। तात्पर्य यह है कि काव्य के प्रथम सोपान से अन्तिम सोपान तक अलङ्कार कवि को बाँधे रहते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eसम्पूर्ण साहित्यशास्त्र के इतिहास में जितना विकास अलङ्कारों का हुआ, उतना किसी अन्य उपादान का नहीं। कहाँ भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र (17.43) में 'उपमा रूपकं चैव दीपकं यमकं तथा' कहकर केवल चार अलङ्कारों की सत्ता नाटक के पाठ्यांश के सन्दर्भ में स्वीकार की थी (300 ई०पू०); वहीं दो सहस्र वर्ष बाद ये ही अलङ्कार क्रमशः बढ़ते हुए अप्पयदीक्षित के कुवलयानन्द में 123 की संख्या तक पहुँच गये। अन्य काव्योपादानों का विकास इस गति से नहीं हुआ। रसों, गुणों और रीतियों को न्यूनाधिक रूप से अपनी नियत संख्या में ही रहना पड़ा। वक्रता के स्थूल भेद छह से आगे नहीं बढ़ सके, उधर क्षेमेन्द्र भी औचित्य भेद के नैयत्य से ग्रस्त रहे।\u003c\/p\u003e","brand":"Kundan Kumar","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":49416972894346,"sku":"9788194969211","price":1192.5,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0592\/8583\/1818\/files\/had419.webp?v=1778653044","url":"https:\/\/www.motilalbanarsidass.com\/en-us\/products\/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%b7%e0%a4%a3","provider":"Motilal Banarsidass","version":"1.0","type":"link"}