{"product_id":"चन्द्र-संस्कृत-व्याकरणम्","title":"चन्द्र-संस्कृत व्याकरणम् - Chandra-Sanskrit Vyakaranam","description":"\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eलघुसिद्धान्तकौमुदी - श्रीधरानन्द शास्त्री\u003cbr\u003eहिन्दी में लघुसिद्धान्तकौमुदी पर यह एक सुन्दर, सरल, प्रामाणिक और सुबोध व्याख्या है। इसकी भाषा आधुनिक है और सम्पूर्ण प्रयोगों की साधन प्रक्रिया, शब्दों और धातुओं के आकांक्षित रूप सुव्यस्थित ढंग से टीका में प्रदर्शित किये गए हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eसूत्रों का शब्दार्थ पृथक् देकर विवरण स्पष्ट किया गया है। प्रत्येक सिद्धि को पूर्ण प्रकार दिखाया गया है। पलिंग में प्रत्येक शब्द और तिङत में प्रत्येक धातु के पूर्ण रूप दिये गये हैं। प्रस्तुत पुस्तक में ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं जिससे यह छात्रों के लिए एक निधि बन गई है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eवैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी [कारक प्रकरण] श्रीधरानन्द शास्त्री\u003cbr\u003eइस प्रकरण में उपपद और कारक विभक्तियों के अर्थों का विस्तृत विवेचन किया गया है इसलिए इस प्रकरण का नाम सार्थक है। विभक्तियाँ जिन अर्थों को प्रकट करती हैं, उन्हें कारक कहते हैं। कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, आदि कारक विभक्तियाँ हैं। कारक-विभक्तियों के अतिरिक्त उन विभक्तियों का भी वहाँ निरूपण किया गया है, जो पदों के योग में आती हैं और जिन्हें उपपद कहते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eतृतीय कोटि में काल, अध्वन्, आदि अर्थवाचक शब्दों के साथ आने वाली विभक्तियों का भी वर्णन है जो न कारक हैं. न उपपद। इस प्रकारण की हिन्दी व्याख्या में मनीषी व्याख्याकार ने इन तीनों का सोदाहरण विवेचन किया है, जो कि व्याकरणशास्त्र के छात्रों के लिए परमोपयोगी सिद्ध होगा।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eवैयाकरणसिद्धान्त कौमुदी-श्रीमद्भट्टोजिदीक्षित विरचिता\u003cbr\u003e[सविमर्श 'ध्रुवविलासिनी' हिन्दोव्याख्योपेता] रामविलास चौधरी\u003cbr\u003eप्रायः हर भाषा के ज्ञान के लिए उसके व्याकरण के नियमों को जानना आवश्यक है, किन्तु संस्कृत में प्रवेश के लिए व्याकरण ज्ञान अपरिहार्य है। इसके बिना इसमें कदम बढ़ाना निरा बेवकूफीभरा एवं हास्यास्पद होगा। इसी कारण शास्त्री में व्याकरण को सर्वप्रधान कहा गया है। महाभाष्यकार का मत है \"प्रधानं च षट्सु अङ्गेष व्याकरणम्। प्रधाने च कृतो यत्नः फलवान् भवति।\" अर्थात् सभी वेदाङ्गों (छन्द, कल्प, ज्योतिष, निरुक्त, व्याकरण और शिक्षा) में व्याकरण प्रधान है और प्रधान के प्रति किया गया प्रयास ही फलित होता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eमहामुनि पतञ्जलि ने महाभाष्य में व्याकरण के प्रमुख पाँच प्रयोजनों (रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह) के साथ बहुत से गौण प्रयोजनों का भी विवेचन किया है। व्याकरण ज्ञान के अभाव में शब्दों को समझना दुष्कर है। इसमें विषय का विवेचन सहज, बोधगम्य, किन्तु स्तरीयरूप में करने का प्रयास किया गया है।\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Nemichandra Shastri","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47483664859274,"sku":"9788120824942","price":487.5,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0592\/8583\/1818\/files\/chandra-sanskrit-vyakaranam-8546346.jpg?v=1766228889","url":"https:\/\/www.motilalbanarsidass.com\/en-us\/products\/%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3%e0%a4%ae%e0%a5%8d","provider":"Motilal Banarsidass","version":"1.0","type":"link"}