{"product_id":"ध्यान-विचार-dhyana-vichara","title":"ध्यान विचार - Dhyana Vichara","description":"\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eसागर जैसी विशाल द्वादशांगी का सार निर्मल ध्यान योग है। श्रावक और साधु के जो मूल गुण एवं उत्तरगुण हैं तथा जो बाह्य क्रियाएँ दर्शायी गई हैं, वे सब ध्यान योग को सिद्ध करने हेतु है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eध्यान सिद्धि का क्रम इस प्रकार है। ध्यान सिद्धि का उद्देश्य मुक्ति होना चाहिये, ध्यान सिद्धि के लिये मन-प्रसाद चाहिये अर्थात् चित्त प्रसन्न होना चाहिये। चित्त प्रसन्नता, अहिंसा, सयंम और तप आदि विशुद्ध अनुष्ठानों को उल्लास पूर्वक आसेवन करने से सिद्धि कर सकते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eसाधना को शुरुआत चित्त की निर्मलता से होती है। चित्त की निर्मलता के बिना वास्तविक स्थिरता एवं तन्मयता आत्मसात् होती ही नहीं है। जिनागर्मी में दर्शाये हुए मोक्ष साधक प्रत्येक अनुष्ठानों की भावपूर्वक आराधना, सर्वप्रथम साधक के चित्त को निर्मल बनाती है, तद्वपरान्त उसके फलस्वरुप क्रमशः चित्त की स्थिरता होने पर परमात्मा में तन्मयता सिद्ध होती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eअहिंसा धर्म के पालन से चित्त निर्मल बनता है संयम धर्म के पालन से चित्त स्थिर बनता है तपधर्म के पालन से चित्त आत्मस्वरुप में लीन बनता है।\u003c\/p\u003e","brand":"Shri Nainamlaji Surana Sirohi","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":49929992110218,"sku":"9788120831063","price":1360.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0592\/8583\/1818\/files\/DhyanVicharCOVERCURVE_57fdb955-3440-4d6b-b9f8-2e952c8dccad.jpg?v=1786518877","url":"https:\/\/www.motilalbanarsidass.com\/en-us\/products\/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-dhyana-vichara","provider":"Motilal Banarsidass","version":"1.0","type":"link"}