{"product_id":"मित्रलाभः-mitra-labha","title":"मित्रलाभः - Mitra Labha","description":"\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eसम्पूर्ण विश्वसाहित्य में भारतीय कथासाहित्य का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भारतीय कथासाहित्य को विश्वकथासाहित्य का 'जनक' कहा जाए तो सम्भवतः कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारतीय कथा-साहित्य अत्यन्त समृद्ध साहित्य रहा है। पशु-पक्षी के माध्यम से सदाचार, राजनीति एवं लोकव्यवहार की शिक्षा प्रदान करना इसका प्रमुख उद्देश्य रहा है। दूसरे शब्दों में यहाँ पशु-पक्षियों का मानवीकरण किया गया है। साथ ही इसमें रोचकता, सरलता, मधुरता एवं उपदेशात्मकता के भी दर्शन होते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eयह कथासाहित्य हमारे समक्ष प्राचीन विचारधारा, जनजीवन एवं राजनैतिक कार्यकलापों की झांकी प्रस्तुत करता है। इसमें पात्र प्रायः व्यक्ति न होकर पशु-पक्षी तथा अन्य जीवों को रखा गया है। अन्य साहित्य के समान ही कथासाहित्य का उद्गम भी हमारे प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद से स्वीकार किया गया है। ऋग्वेद में प्रयुक्त देवशुनी, सरमा पणि संवाद आदि को प्राचीन भारतीय कथासाहित्य का प्रेरक माना जा सकता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eवस्तुतः भारतीय-चिन्तन जीव-जन्तुओं के साथ अत्यधिक आत्मीयभाव रखता है, जिसकी अभिव्यक्ति हमें कथासाहित्य में भी मिलती है। इसी कारण ये पात्र भले ही पक्षु-पक्षी वा अन्य जीव हों, उनमें मनुष्य के समान ही मित्रता, शत्रुता, प्रेम, छल, प्रपञ्च, लोभ लालब आदि विद्यमान होते हैं। बस्तुतः ये सभी मानवीयगुण तथा स्वभाव से युक्त होने के कारण अत्यन्त रोचक बन पड़े हैं। इनकी लोकप्रियता का एक कारण यह भी स्वीकार किया जाता है कि इनकी शैली सरल एवं सुबोध है, इनमें पाण्डित्यप्रदर्शन का सर्वथा अभाव है, कथाओं में स्वाभाविक प्रवाह है तथा इनमें जीवन की सफलता के लिए आवश्यक मार्गदर्शन दिया गया है। जीवन में असफलता के कारणों की ओर संकेत करके उनसे बचने की चेतावनी भी दी गई है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eइसी कथासाहित्य का सर्वाधिक प्राचीन संस्कृत कथाग्रन्थ पञ्चतन्त्र को माना जाता है। इसके रचयिता आचार्य विष्णुशर्मा हैं तथा उनका समय विद्वानों ने ३०० ई. पू. माना है। इसमें पाँच तन्त्र हैं- (क) मित्रभेद-इसमें दो मित्रों में झगड़ा कराने की नीति का कथन हुआ है। (ख) मित्रसम्प्राप्ति-इसमें मित्र बनाने के उपायों का उल्लेख है। (ग) काकोलूकीय-इसमें स्वार्थसिद्धि हेतु शत्रु से भी मित्रता करना एवं बाद में उसे नष्ट करने को कहा गया है। (घ) लब्धप्रणाश-बुद्धिमान् अपनी बुद्धि के बल से विजय प्राप्त करता है तथा मूर्ख हाथ आई वस्तु को भी खो देता है. इसका प्रतिपादन किया गया है। (ङ) अपरीक्षितकारकम्-कोई भी कार्य बिना विचारे जल्दीबाजी में नहीं करना चाहिए, इसकी शिक्षा दी गई है।\u003c\/p\u003e","brand":"Dr. Rakesh Shastri","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47844765958282,"sku":null,"price":525.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0592\/8583\/1818\/files\/Mitra_Labha.webp?v=1773901998","url":"https:\/\/www.motilalbanarsidass.com\/en-us\/products\/%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ad%e0%a4%83-mitra-labha","provider":"Motilal Banarsidass","version":"1.0","type":"link"}