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ऋतुशतकम्

ऋतुशतकम्

Publisher: Manyata Prakashan
Language: Sanskrit & Hindi
Total Pages: 135
Available in: Paperback
Regular price Rs. 275.00
Unit price per
Tax included.

Description

प्राचीन भारत में अनेक कवियों ने मधुर महाकाव्य, खण्डकाव्य तथा विभिन्न रसों से परिपूर्ण अनेक नाटक लिखकर संस्कृत साहित्य को अत्यन्त समृद्ध किया है। वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ने रामायण एवं महाभारत नामक अद्भुत ग्रन्थ लिखे। उन उपजीव्य ग्रन्थों को आधार बनाकर महाकवि भास, कालिदास, भवभूति और माघ आदि कवियों ने सुन्दर काव्य एवं नाटकों की रचना की तथा संस्कृत साहित्य के कलेवर को निरन्तर बढ़ाया। श्रेष्ठ संस्कृत रचनाओं को लिखने की परम्परा आज भी निर्बाध गति से चल रही है। विगत शताब्दी में अनेक कवियों ने सैकड़ों महाकाव्य, खण्डकाव्य एवं नाटक लिखे हैं।

नवीन रचनाओं के सन्दर्भ में उ०प्र०, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के विद्वानों का विशेष योगदान रहा है। उ०प्र० के आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी, श्री कृष्ण सेमवाल, डॉ० रमाकान्त शुक्ल, अभिराज राजेन्द्र मिश्र, प्रो० राधा वल्लभ त्रिपाठी, प्रो० हरिराम आचार्य, प्रो० सुभाष वेदालंकार, डॉ० बनमाली बिश्वाल, डॉ० कपिलदेव द्विवेदी आदि विद्वान विशेष उल्लेखनीय हैं।

इसी क्रम में राजस्थान प्रान्त में संस्कृत विद्वानों की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। राजस्थान के विद्वानों में पं० विद्याधर शास्त्री, भट्ट मथुरानाथ शास्त्री, पण्डित गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, आचार्य जगदीश शास्त्री, पण्डित श्रीरामदबे, डॉ० पुष्करदत्त शर्मा, प्रो० हरिराम आचार्य, महामहोपाध्याय पण्डित नवल किशोर कांकर, डॉ० नारायण शास्त्री, प्रो० सुभाष वेदालंकार, श्रीपद्म शास्त्री इत्यादि का विशेष स्थान है।

इसी परम्परा में कविवरभट्ट गिरिधारी लाल शर्मा महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कविवरभट्ट ने संस्कृत भाषा में अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है, जिनमें प्रमुख तीन हैं ऋतुशतकम्, सरस्वती संदेशः और गोविन्द गीतिः। ऋतुशतकम् नामक प्रस्तुत श्रृङ्गारिक गीति काव्य में कविवरभट्ट ने क्रमशः ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, शीत और वसन्त इन पञ्च ऋतुओं का मनोहारी वर्णन किया है। श्रृङ्गारिक गीति काव्यों में महनीय सम्मान के पात्र इस काव्य की काव्य गत विशेषताओं का अवलोकन करने के बाद कोई भी सहृदय पाठक इस काव्य के प्रति आकृष्ट हुए बिना नहीं रह सकता। इसलिए मैंने ऋतुशतकम् का सम्पादन, अनुवाद एवं परिशीलन करने का संकल्प लिया, जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।

मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि निश्चय ही यह पुस्तक विद्वत्समाज में अत्यधिक समादूत होगी और संस्कृत-प्रेमियों, जिज्ञासुओं, अनुसन्धाताओं (शोधार्थियों) शिक्षकों और अध्येताओं की पिपाशा शान्त करने के साथ ही ऋतु वर्णन से सम्बन्धित विभिन्न आयामों को भी भली-भांति समझने में और सकारात्मक दिशा की ओर मार्ग प्रशस्त करने में अनेक दृष्टियों से परम महत्त्वपूर्ण, सहायक एवं उपयोगी सिद्ध होगी और अपने प्रकाशन के प्रयोजन को सफल सिद्ध करेगी।