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चन्द्र-संस्कृत व्याकरणम् - Chandra-Sanskrit Vyakaranam

Publisher: Motilal Banarsidass
Language: Sanskrit
Total Pages: 303
Available in: Paperback
Regular price Rs. 325.00
Unit price per
Tax included.

Description

लघुसिद्धान्तकौमुदी - श्रीधरानन्द शास्त्री
हिन्दी में लघुसिद्धान्तकौमुदी पर यह एक सुन्दर, सरल, प्रामाणिक और सुबोध व्याख्या है। इसकी भाषा आधुनिक है और सम्पूर्ण प्रयोगों की साधन प्रक्रिया, शब्दों और धातुओं के आकांक्षित रूप सुव्यस्थित ढंग से टीका में प्रदर्शित किये गए हैं।

सूत्रों का शब्दार्थ पृथक् देकर विवरण स्पष्ट किया गया है। प्रत्येक सिद्धि को पूर्ण प्रकार दिखाया गया है। पलिंग में प्रत्येक शब्द और तिङत में प्रत्येक धातु के पूर्ण रूप दिये गये हैं। प्रस्तुत पुस्तक में ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं जिससे यह छात्रों के लिए एक निधि बन गई है।

वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी [कारक प्रकरण] श्रीधरानन्द शास्त्री
इस प्रकरण में उपपद और कारक विभक्तियों के अर्थों का विस्तृत विवेचन किया गया है इसलिए इस प्रकरण का नाम सार्थक है। विभक्तियाँ जिन अर्थों को प्रकट करती हैं, उन्हें कारक कहते हैं। कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, आदि कारक विभक्तियाँ हैं। कारक-विभक्तियों के अतिरिक्त उन विभक्तियों का भी वहाँ निरूपण किया गया है, जो पदों के योग में आती हैं और जिन्हें उपपद कहते हैं।

तृतीय कोटि में काल, अध्वन्, आदि अर्थवाचक शब्दों के साथ आने वाली विभक्तियों का भी वर्णन है जो न कारक हैं. न उपपद। इस प्रकारण की हिन्दी व्याख्या में मनीषी व्याख्याकार ने इन तीनों का सोदाहरण विवेचन किया है, जो कि व्याकरणशास्त्र के छात्रों के लिए परमोपयोगी सिद्ध होगा।

वैयाकरणसिद्धान्त कौमुदी-श्रीमद्भट्टोजिदीक्षित विरचिता
[सविमर्श 'ध्रुवविलासिनी' हिन्दोव्याख्योपेता] रामविलास चौधरी
प्रायः हर भाषा के ज्ञान के लिए उसके व्याकरण के नियमों को जानना आवश्यक है, किन्तु संस्कृत में प्रवेश के लिए व्याकरण ज्ञान अपरिहार्य है। इसके बिना इसमें कदम बढ़ाना निरा बेवकूफीभरा एवं हास्यास्पद होगा। इसी कारण शास्त्री में व्याकरण को सर्वप्रधान कहा गया है। महाभाष्यकार का मत है "प्रधानं च षट्सु अङ्गेष व्याकरणम्। प्रधाने च कृतो यत्नः फलवान् भवति।" अर्थात् सभी वेदाङ्गों (छन्द, कल्प, ज्योतिष, निरुक्त, व्याकरण और शिक्षा) में व्याकरण प्रधान है और प्रधान के प्रति किया गया प्रयास ही फलित होता है।

महामुनि पतञ्जलि ने महाभाष्य में व्याकरण के प्रमुख पाँच प्रयोजनों (रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह) के साथ बहुत से गौण प्रयोजनों का भी विवेचन किया है। व्याकरण ज्ञान के अभाव में शब्दों को समझना दुष्कर है। इसमें विषय का विवेचन सहज, बोधगम्य, किन्तु स्तरीयरूप में करने का प्रयास किया गया है।