Description
भारत में संस्कृत विद्वानों की सुदीर्घ परम्परा रही है। उसी परम्परा में कविश्रेष्ठ श्री रामकृष्ण महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। सम्वत् 1913 में श्री सुखदेव द्वारा वृन्दावन में कविवर श्री रामकृष्ण की कृति "कृष्णलीलामृतार्णवम्" की हस्तलिपि की गई, अतः अनुमान है कि कवि श्री रामकृष्ण का निवास मथुरा के आस-पास रहा होगा। कृष्णलीलामृतार्णवम् (पूर्व भाग) ग्रन्थ पाण्डुलिपि के रूप में प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान अलवर में उपलब्ध है। यह एक पूर्ण महाकाव्य है।
कविवर श्री रामकृष्ण ने अपनी इस रचना में भगवान श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन विविध पुराणों से संग्रह कर किया है। मंगलाचरण के बाद ब्रह्मवैवर्तपुराण का परिचय, नारायण-नारद संवाद, सप्त समुद्रजन्म, गोलोक वर्णन, विश्वरूप दर्शन, वृन्दावन प्रवेश, यमुना वर्णन, राधा कृष्ण विवाह वर्णन, गोवर्धन धारण, गोपीगीत वर्णन, रास क्रीड़ा, वृन्दावन क्रीड़ा, वृन्दावन लीला वर्णन इत्यादि प्रसंगों का मार्मिक, हृदय स्पर्शी वर्णन कवि व उनको कृति की महत्ता को रेखांकित करते।
मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि डॉ. उर्मिला मीणा अपने पी-एच.डी. शोधग्रन्य को पुस्तकाकार प्रदान कर रही हैं। उक्त रचना पुस्तक का रूप लेकर भारतीय समाज को सरलता से सुलभ होगी जिससे भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं व उनमें निहित रहस्यों से समाज रूबरू होता हुआ, आध्यात्मिकता की ओर बढ़ेगा।
मुझे विश्वास है कि विद्वत् समाज इस कृति का समुचित आदर करेगा। डॉ. उर्मिला की सशक्त लेखनी इसी प्रकार माँ भारती के भण्डार को समृद्ध करती रहेंगी।