• समकालीन भारतीय चिंतक - Samkaleen Bharatiya Chintak
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समकालीन भारतीय चिंतक - Samkaleen Bharatiya Chintak

Publisher: Motilal Banarsidass
Language: Hindi
Total Pages: 450
Available in: Paperback
Regular price Rs. 450.00 INR
Tax included.

Description

वर्तमान युग पुनर्जागरण का युग है। नवजागरण नूतनता का पोषक है। समकालीन भारतीय चिंतक प्राचीन परम्परा की अच्छी बातों को ग्रहण करके नए विचार और दर्शन की सर्जना करते हैं। समकालीन चिंतक उच युग की उपज हैं जब भारतवर्ष एक लंबी दासता एवं विदेशी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत था, स्वतंत्र चिंतन का विकास एक तरह से अवरुद्ध सा हो गया था। वैसी परिस्थिति में जो भी आधुनिक विचारक हमारे सामने उभरकर आए हैं, उनकी विश्व दृष्टि भावात्मक, संश्लेषणात्मक एवं व्यापक रही।

समकालीन भारतीय चिंतकों का विचार व्यापक है, क्योंकि एक तरफ वे लोग वेद, उपनिषद् तथा कुरान से परिचित हैं. दूसरी तरफ पश्चिमी दर्शन से भी अवगत हैं। यही कारण है कि समकालीन भारतीय चिंतकों को एक तरफ अपनी प्राचीन परम्परा से मोह है, और वहीं दूसरी तरफ ये लोग वैज्ञानिक प्रगति के भी कायल हैं। समकालीन भारतीय चिंतकों ने प्राचीन एवं अर्वाचीन तथा पूरब एवं पश्चिम की खाई को पाटने का प्रयास किया है। इस पुस्तक में राजा राममोहन राय, रवीन्द्रनाथ टेगोर, विवेकानन्दः महात्मा गांधी, श्री अरविन्द, इकबाल, कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एम.एन. राय, भीमराव अम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरू, जे. कृष्णमूर्ति; ज्योतिबा फुले और जयप्रकाश नारायण जैसे चिंतकों के चिंतन की विवेचना की गई है।

समकालीन भारतीय चिंतकों के चिंतन की विशेषताओं में विश्व के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण-विश्व-दृष्टि: संश्लेषणात्मक दृष्टिः ईश्वरवाद एवं ब्रहाकदः जड़ और चेतन के द्वैत का निराकरण तथा एकवाद की पुष्टि-अतिमानव या देवमानव का विकास, और सर्वमुक्ति प्रमुख हैं।
प्रोफेसर रमेश चन्द्र सिन्हा संप्रति भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के राष्ट्रीय अध्येता (National Fellow) के रूप में कार्यरत हैं। इसके पूर्व आप भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के अध्यक्ष, पटना विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (1970 से 2004 तक) रह चुके हैं। आप पटना विश्वविद्यालय के सीनेट एवं सिंडिकेट के सदस्य, शिक्षक संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं। आपने 1969 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की, साथ ही 1968-70 तक वहीं स्नातकोत्तर भारतीय दर्शन एवं धर्म विभाग में शिक्षण कार्य किया। लगभग चालीस वर्षों के शिक्षण एवं शोध कार्य के दौरान आप ने सात पुस्तकों की रचना तथा पाँच पुस्तकों का संपादन किया है, जिनमें शामिल है-Concepts of Reason and Intuition, समकालीन भारतीय चिन्तक, Subaltern Morality: A Postmodern Vision, Subaltern Morality in post Ramayana Ramkatha, Religious Identity and the Concept of Others तथा सीमान्त नैतिकता।

प्रोफेसर विजय श्री अपने शिक्षण जीवन के आरंभ में सन् 1974 में श्री अरविन्द महिला कॉलेज, मगध विश्वविद्यालय से जुड़ीं और तत्पश्चात् पटना विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र विभाग में 1980 से कार्यरत रहीं, जहाँ उन्होंने अपनी विद्वता एवं शोध दृष्टि से विभाग को गौरवान्वित किया। इसके पूर्व उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा बी. ए. की (सागर विश्वविद्यालय), एम. ए (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) तथा डी. फिल. (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) से पूर्ण की। उनकी तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें तथा विभिन्न प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में उनके अनेक स्तरीय दार्शनिक निबंध प्रकाशित हुए हैं, जिन्होंने भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन के समन्वय को एक नई दिशा प्रदान की है।