Description
इस उपनिषद् में हम यम ऋषि के साथ नचिकेता सम्वाद का वर्णन लिख रहे हैं। वेदों और उपनिषदों की संस्कृत असाधारण होने के कारण साधारण बुद्धि से समझ पाना कठिन है। अतः प्रत्येक संस्कृत शब्द का संधि-विच्छेद कर उसके अर्थों को समझाना भी आवश्यक समझा गया है। इस प्रकार हिन्दी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में शब्दार्थ के साथ मंत्रार्थ भी इस कारण से लिखे जा रहे हैं ताकि साधारण हिन्दी-अंग्रेजी जानने वाले पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सकें। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर लोगों का भ्रम दूर करना अपना धर्म समझता हूँ कि यम जिसकी कल्पना हम मृत्यु के उस देवता से करते हैं जो भैंसे पर बैठकर आता है और जीव को शरीर से निकाल कर ले जाता है।
वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन समाप्त हो जाना ही इस भ्रमपूर्ण स्थिति का कारण हुआ और हमारा समाज धर्मग्रन्थों का शुद्ध अध्ययन करना ही नहीं चाहता है। यम को भैंसे पर सवार मृत्युदाता कह दिया गया। वानर (वन में रहने वाले वानप्रस्थ) हनुमान को बन्दर, सम्पाती ऋषि को रीछ बना दिया। गणेश को हाथी का सिर लगा दिया और न जाने कैसे कैसे ढोंग बना दिये और हम अपने शास्त्रों, वेदों से अनभिज्ञ अपने ही पूर्वजों का अपमान करते आ रहे हैं, कर रहे हैं और न जाने कब तक इसी प्रकार करते रहेंगे।
वास्तव में उस काल में यम नाम के ऋषि थे जो जीवन-मृत्यु, स्वर्ग-नरक आदि विषय के अधिष्ठाता थे। उनके समकक्ष विद्वान अपने विषय का कोई भी व्यक्ति नहीं था। इसी कारण उस ऋषि का नाम ही यमराज, मृत्यु-ज्ञान-दाता से ज्ञान शब्द मिट गया और मृत्युदाता रह गया। उनकी कोई तो सवारी होनी ही चाहिए अतः भैंसा उनकी सवारी बना दी गई। उनका यह कृत्य परोपकार नहीं वरन् पापाचार हो गया और हम धर्म से सर्वथा अध्ययनविरत लोग इन तथा कथित पापियों, जिनका धर्म इसी से पेट-पालना हो गया, के जाल में फंसते आ रहे हैं, आगे भी फंसते रहेंगे। पाठक बुद्धि का प्रयोग कर इसे समझेंगे और भ्रम मुक्त होंगे।
अभी तक ईशोपनिषद् एवं केनोपनिषद् के भाष्य लिख चुका हूँ जिनमें मानव मात्र के कर्मों का, ईश्वर दर्शन, प्रकृति, तत्वों (पंचभूतों) द्वारा जीवात्मा का ईश्वर से सम्बन्ध न हो पाना तथा किन उपायों से ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं अर्थात् उसे महसूस किया