{"product_id":"जैन-विज्ञान-jain-vigyan-1994","title":"जैन विज्ञान - Jain vigyan (1994)","description":"\u003cp\u003eइस दुनिया में व्यक्ति चार कारणों से झूठ बोलता है-(1) क्रोध (2) लोभ से (3) भय से और (4) हंसी मजाक से।\u003cbr\u003eआवेश में अंध बने व्यक्ति को पता नहीं चलता है कि वह क्या बोल रहा है? आवेश में व्यक्ति नहीं बोलने जैसे शब्द भी बोल देता है और फिर गुस्सा शांत होने के बाद पश्चात्ताप करता है कि मुझे ऐसा नहीं बोलना चाहिए था।\u003cbr\u003eइसी प्रकार ज़ब व्यक्ति लोभ के अधीन बन जाता है, तब भी झूठ बोलता है। वकील या व्यापारी के झूठ बोलने का और क्या प्रयोजन हो सकता हैं ? धन का लोभ हो तो भी व्यक्ति झूठ का आश्रय ले लेता है। अतः लोभ भी झूठ बोलने में प्रेरक तत्व है।\u003cbr\u003eझूठ बोलने का तीसरा कारण है भय। जिसने भूल की हो, चोरी की हो, ऐसा व्यक्ति सजा के भय से झूठ बोल देता है। बालक के हाथ से कांच का गिलास फूट गया हो तो वह भय के मारे झूठ बोल देगा कि 'यह गिलास मैंने नहीं फोड़ा हैं।'\u003cbr\u003eझूठ बोलने का चौथा कारण हैं- हंसी मजाक। पहली अप्रैल के दिन अज्ञानतावश कई व्यक्ति हंसी मजाक में ऐसा झूठ बोल देते है जो किसी के लिए मौत का कारण भी बन जाता है।\u003cbr\u003eमुख्यतया झूठ बोलने के उपरोक्त चार कारण हैं। संसारी व्यक्ति राग व द्वेष के अधीन होने के कारण उपरोक्त चार कारणों को लेकर यदा-कदा झूठ बोल देता हैं, जबकि जो आत्माएं वीतराग-सर्वज्ञ बन चुकी हैं, वे आत्माएं राग-द्वेष से सर्वथा रहित होने के कारण उन्हें झूठ बोलने का कोई प्रयोजन नहीं होता है। क्रोध, लोभ, भय व हास्य ये चारों मोहनीय कर्म के ही भेद है। वीतराग बनी आत्माएं मोहनीय आदि घाति कर्मों से सर्वथा रहित होने के कारण वे जो कुछ भी बोलती हैं, वह सत्य ही बोलती है।\u003cbr\u003eजैन शासन की स्थापना करने वाले श्री अरिहंत परमात्मा सर्वज्ञ और वीतराग होते है। ज्ञानावरणीय कर्म का संपूर्ण क्षय होने के कारण सर्वज्ञ\u003c\/p\u003e","brand":"Muni Shri Ratansen Vijay ji M.Banarsidass","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47473913135242,"sku":null,"price":350.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0592\/8583\/1818\/files\/Jain_vigyan_by_Muni_Shri_-Ratansen_Vijay_ji_M..jpg?v=1766823274","url":"https:\/\/www.motilalbanarsidass.com\/products\/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-jain-vigyan-1994","provider":"Motilal Banarsidass","version":"1.0","type":"link"}