Description
पुस्तक परिचय
'काव्येषु नाटकं रम्यम्' कहकर साहित्यकारों ने नाटक के महत्त्व को रेखांकित करते हुए उसे समस्त काव्य जगत् का सिरमौर स्वीकारा है । संस्कृत नाटकों के पठन-पाठन के दौरान कई ऐसे शब्द आते हैं, जिनका एक विशेष अर्थ होता है तथा वे नाटक के अभिन्न भाग भी होते हैं । प्रकृत पुस्तक में उन विभिन्न नाटकीय शब्दों को संकलित करते हुए नाट्यशास्त्र, दशरूपक व साहित्यदर्पण आदि साहित्यशास्त्रीय ग्रंथों तथा बलदेव उपाध्याय, उमाशंकर शर्मा 'ऋषि', पी.वी. काणे आदि के विचारों के आधार पर परिभाषित किया गया है ।
आचार्य भरत द्वारा लिखा गया 'नाट्यशास्त्र' एक अथाह व अनंत ज्ञानराशि है, जिसे स्नातक स्तर पर छात्रों को पढ़ना असंभव है । अतः संस्कृत नाटकों में रुचि रखने वाले छात्रों तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों के संस्कृत - पाठयक्रम में लगे हुए नाटकों के अध्ययन एवं अध्यापनार्थ यह पुस्तक नाट्यशास्त्र प्रवेशिका के रूप में सहायक सिद्ध
होगी ।