{"product_id":"माण्डूक्य-उपनिषद्","title":"माण्डूक्य उपनिषद्","description":"\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eब्रह्मविद्या की यह पुस्तक सर्वाधिक उत्तम तथा अद्वैतवादियों को अत्यन्त प्रिय सिद्ध होती है। ब्रह्म की चार अवस्थाओं का वर्णन करते हुए बताया गया कि उसके चार पादों में कब मनुष्य प्रथम पाद की स्थिति में वैश्वानर कहा गया, कब तेजस और कब प्राज्ञ कहा गया। इन तीन अवस्थाओं में क्रमशः मनुष्य स्वाभिमानी\/घमण्डी होकर शरीर को ही जीवात्मा मानता है। द्वितीय अवस्था में स्वप्न देखा करता है तब जाग्रत अवस्था में किये कर्म सिनेमा के चित्रों की तरह देखा करता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eउस समय कर्म करने से तो बच जाता है परन्तु जागृत अवस्था के कर्मों को देख दुःखी हुआ करता है। तृतीय स्थिति सुषुप्ति की होती है जिस स्थिति में जीवात्मा समस्त बाह्य और आन्तरिक ज्ञान से मुक्त रहता हुआ न सुख भोगता है न दुःख। तब वह 'प्राज्ञ' कहलाता है। चतुर्थ स्थिति 'तुरीय अवस्था' में वह सर्वत्र ब्रह्म ही ब्रह्म को महसूस करता है, कण-कण में ब्रह्म की उपस्थिति जान उसी में लीन होकर आनन्द प्राप्त करता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp style=\"text-align: left;\"\u003eयह पुस्तक ब्रह्मविद्या का क्रमवार उपदेश करती है। प्रिय पाठकों के लिये जीवन आनन्द की ओर ले जाकर मोक्ष की ओर अग्रसर होने का मार्ग बताती है।\u003c\/p\u003e","brand":"Arjun Dev Arya","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":50151697547402,"sku":"9788170565963","price":200.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0592\/8583\/1818\/files\/IMG_20260907_0010.jpg?v=1788773900","url":"https:\/\/www.motilalbanarsidass.com\/products\/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a4%a6%e0%a5%8d","provider":"Motilal Banarsidass","version":"1.0","type":"link"}