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यौगिक चिंतन में प्राणिक उपचार का रहस्य

यौगिक चिंतन में प्राणिक उपचार का रहस्य

Publisher: Raghav Publication
Language: Hindi
Total Pages: 168
Available in: Paperback
Regular price Rs. 595.00
Unit price per
Tax included.

Description

योग एक प्राचीनतम विद्या होने के साथ-साथ स्वःअनुभूति की एक दिव्य प्रक्रिया भी हैं। पुरातनकाल में योग एक अति गोपनीय विद्या थी तथा कम ही व्यक्ति इस योगविद्या को प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते थें। योग संस्कृत के युज शब्द से बना हैं जिसका अर्थ हैं जोड़ अर्थात् योग के द्वारा हम ईश्वर न जुड़ते हैं। हमारी इन्द्रियों का मुख्य विषय चंचलता हैं योग द्वारा चंचल इन्द्रियों को उनके विषयों से पृथक कर परमतत्व में एकाग्र किया जा सकता हैं। जैसा कि विदित हैं कि हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थों में भी योग के विषय में विस्तार पूर्वक उल्लेख आता हैं श्रीमद्भगवदगीता में भी योगेश्वर श्री कृष्ण ने योग की प्राचीनता को सिद्ध करते हुए कहा हैं कि "मैंने इस अविनाशी योग के विषय में सूर्य को बताया था। 

फिर सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु के समक्ष योगविद्या का वर्णन किया तत्पश्चात् मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को इस गूढ़ विद्या की दीक्षा दी।" भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में योग के विषय में वर्णन करते हुए कहा हैं कि समत्वं योग उच्यते अर्थात् समता भाव ही योग हैं, वही महर्षि पतंजलि ने चित्तवृत्तियों के निरोध को योग की संज्ञा दी हैं। वर्तमान कालखण्ड़ में हम देख सकते हैं कि योग एक बहुचर्चित विषय बनकर उभरा हैं तथा गत वर्षों में योग के पुर्नजागरण में माननीय रामदेव बाबा के साथ साथ हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी का अभूतपूर्व योगदान रहा हैं जिस कारण समाज में योग के प्रति आदर भावना तथा जागरूकता शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ी हैं। लेकिन आज समाज में कुछ लोग, योग को मात्र शारीरिक व्यायाम के तौर पर ही स्वीकारयता देकर इसके क्षेत्र को सीमित दायरे में ही समेटकर देख पा रहे हैं परन्तु हमें समझना होगा कि योग को किसी एक सीमित दायरे में कदापि बांधा नहीं जा सकता हैं। प्रकृति की प्रत्येक कला में योग प्रत्यक्ष व अप्रत्यतक्ष रूप में समाहित हैं। बस आवश्यकता हैं तो योग को गहराई से अनुभव कर अपने जीवन में उतारने की।