Description
प्राचीन काल में योग का मुख्य लक्ष्य समाधि और मोक्ष प्राप्ति था। लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में योग के विभिन्न आयाम उभरकर सामने आ रहे हैं। आज योग आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ स्वास्थ्य, रोजगार और असाध्य रोगों की चिकित्सा के साथ आत्मिक शांति की प्राप्ति का माध्यम बन चुका है। योग के विभिन्न आयाम है, जिसका आधार कई स्तंभों पर टिका हुआ है, जैसे-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, मुद्रा-बंध, षट्कर्म, आहार-विहार आदि।
प्राचीन समय में योग के सभी प्रमुख ग्रंथों योगसूत्र, भगवद्गीता, योगवशिष्ठ आदि सभी में चित्त व मन की शुद्धि पर अधिक बल दिया गया था। क्योंकि उस दौर में सभी योग साधक प्रकृति की शरण में रहकर ही योग अभ्यास करते थे। आहार-विहार शुद्ध और सात्विक था, पर्यावरण भी पूरी तरह शुद्ध था। लेकिन समय अनुसार आहार-विहार, शरीर, मन, चित्त, पर्यावरण आदि में अशुद्धियाँ बढ़ने लग लग गई।
हमारे ऋषि-मुनि और हठयोगी साधकों ने तात्कालिक परस्थितियों को समझते हुए षट्कर्म जैसी महत्वपूर्ण क्रियाओं पर अधिक बल दिया। क्योंकि शरीर और मन की शुद्धि के बिना योग साधना में सफलता नहीं मिल सकती है। गुरु गोरखनाथ, स्वामी स्वात्माराम, महर्षि घेरंड, श्रीनिवास योगी भट्ट, स्वामी चरणदास आदि हठयोगियों ने शरीर के आंतरिक अंगों और विभिन्न संस्थानों की शुद्धि के लिए अपने तपोबल एवं लम्बे अनुभव के बाद योग की विभिन्न क्रियाओं को ईजाद किया, जो आज भी आध्यात्मिकता के साथ-साथ विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरती हैं।
धौति, बस्ती, नेति, नौली, त्राटक, कपालभाति, कुँजल, चक्री आदि शोधन क्रियाएं वर्तमान में भी प्रचलित हैं। लेकिन इन सभी शोधन क्रियाओं को सामान्य व्यक्ति के लिए एक साथ करना बहुत कठिन है। इसलिए वर्तमान की भागदौड़ भरी और प्रतिस्पर्धा भरी जिंदगी में स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, स्वामी शिवानंद, सरस्वती, स्वामी रामदेव आदि योगियों ने षट्कर्म की सबसे महत्वपूर्ण शोधन क्रिया वारिसार धौति अर्थात् शंख प्रक्षालन पर अधिक बल दिया। वर्तमान में शंख प्रक्षालन बहुत ही प्रचलित क्रिया है। इसका अभ्यास आज प्रमुख योग संस्थानों, योग केंद्रों, प्राकृतिक चिकित्सालयों, आयुर्वेद संस्थानों हॉस्पिटल्स, योग शिविरों में प्रमुखता से करवाया जाता है।
वर्तमान में योग की इस महत्वपूर्ण विधा पर कोई प्रमाणित साहित्य उपलब्ध नहीं हो पा रहा था और न ही विस्तार से इस पर कोई जानकारी उपलब्ध थी। इसी को ध्यान में रखते हुए योगियों से परंपरागत प्राप्त योग की इस अमूल्य विधा को शुद्ध रूप में आम जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से हम सब ने सरल शब्दों के साथ इस पुस्तक को मिलकर लिखने का यथासंभव प्रयास किया है। हमारा यह प्रयास कितना सार्थक रहा ये सब आपके अमूल्य सुझावों से ही पता चलेगा।
शंख प्रक्षालन पुस्तक में सबसे पहले शंख प्रक्षालन अर्थात् वारिसार धौति का परिचय दिया गया है। जिसमें शंख प्रक्षालन का अर्थ, परिभाषा और ऐतिहासिक स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है।