🔄

याज्ञवल्क्यस्मृति: - Yajnavalkya Smrti

याज्ञवल्क्यस्मृति: - Yajnavalkya Smrti

Publisher: Rashtriya Sanskrit Sahitya Kendra
Language: Sanskrit Text with Hindi Translation
Total Pages: 400
Available in: Paperback
Regular price Rs. 300.00
Unit price per
Tax included.

Description

भारतवर्ष कर्मभूमि और धर्मभूमि दोनों हैं। हिन्दूधर्म सनातन धर्म के रूप में अक्षयवट की तरह है। हिन्दुओं के व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म का प्राधान्य है। इसलिए धर्म का व्यापक संदर्भमिलता है और धर्म के विषय में जितनी चर्चा यहाँ हिन्दुओं में है उतनी अन्यत्र दुलर्भ है। धर्म के नाम पर यहाँ बड़ी बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी गई हैं। बड़े बड़े धर्म धुरन्धरों से संघर्ष हुए हैं, शास्त्रार्थ हुए हैं भारतीय सपूत और वीर धर्म की रक्षा में अपने जीदन को हंसते हंसते गवां दिए हैं। इसलिए भारतीयों को धर्म प्राणों से भी प्यारा है। (स्वधर्मे निधनं श्रेयः गीता) यहाँ के गुरुकुलों के शैक्षणिक वातावरण में धर्मशिक्षा का महत्वपूर्ण अंश है। 'सत्यं वद, धर्म चर यही यहाँ का उद्घोष है। शास्त्रों में स्वर्ग-नरक की चर्चा भी खूब हुई है। स्वर्ग की प्राप्ति के लिए विभिन्न मार्ग बताये गये हैं।

परन्तु वैदिक आर्यों का यज्ञ ही मुख्य साधन था (स्वर्गकामो यजेत) जिसके माध्यम से स्वर्ग की सिद्धि हो सकती है। अतः एक से एक बढ़कर व्यवसाय यज्ञ भी यहाँ बहुत हुए हैं। जिसकी चरम सम्पन्नता में हिंसा के मार्ग अपनाने में भी हिन्दुओं को जो भी हिंसक नहीं हुई (वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति)। दान-धर्म के विषय में भी हिन्दु शास्त्रों में बहुत महिमा मानी गई है। इस दानधर्म में अपना और अपने पुत्रों तक की बलि दी गई है। इन सब के मूल में धर्म काम करता है। इस धर्म-कर्म, आधार विचार के विषय में ब्राह्मण साहित्य का बहुत बड़ा भाग है।