Description
पातञ्जल अष्टाङ्ग योग प्रकाश नामक पुस्तक में सुयोग्य लेखक ने अपनी साधना के अनुभव को सञ्जोया है। जिससे यह पुस्तक मात्र ज्ञान का साधन न रहकर जीवन जीने की कला का आधार बन गयी हैं। अष्टाङ्गयोग योग को अपना कर प्रत्येक व्यक्ति आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों से मुक्त होकर आनन्द पूर्वक जीवन यापन करने में समर्थ हो जाता है। योग की वैज्ञानिक उपयोगिता और गरिमा के जिन सिद्धान्तों का विवेचन योग के तत्तवेत्ता ऋषियों ने किया था, वर्तमान में वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशालाओं में किये जा रहे अनुसन्धान उनको प्रमाणिक सिद्ध कर रहे हैं।
अनेक प्रकार के ऐसे असाध्य रोग हैं जिनका निराकरण वर्तमान में प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों द्वारा सम्भव नहीं हो पाता। वे रोग अष्टाङ्गयोग के अभ्यास से पूर्ण रूप से समाप्त हो जाते हैं।
यही कारण है कि आज सर्वत्र योग के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। अष्टाङ्गयोग के सिद्धान्त किसी सम्प्रादय, देश अथवा मानव समुदाय से सम्बन्धित नहीं हैं। अपितु योग के सिद्धान्त सार्वदेशिक, सार्वजनिक सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं।
अष्टाङ्गयोग का प्रथम अङ्ग सामाजिक आचार मीमांसा के सिद्धान्तों से ओतप्रोत है। दूसरा अङ्ग व्यक्तिगत आचार मीमांसा के सिद्धान्त हैं। यदि प्रारम्भिक शिक्षा के समय ही इनका ज्ञान शिक्षार्थियों को करा दिया जाये तो एक सुसंस्कृत विश्व के निर्माण में महत्त्व पूर्ण प्रयास होगा।