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Tajik Neelakanthi of Neelakantha Daivagya

Publisher: Motilal Banarsidass
Language: Sanskrit & Hindi
Total Pages: 502
Available in: Paperback & Hardbound
Regular price Rs. 817.50 Sale price
Unit price per
Tax included.

Description

ज्योतिष शास्त्र के होरा-स्कन्ध में ताजिक ज्योतिष का समावेश होता है। मानव की पूर्ण आयु में प्रत्येक नवीन वर्ष के प्रवेश-समय को जानकर कुण्डली द्वारा वर्षपर्यन्त प्रत्येक मास का, प्रत्येक दिन व दिनार्थ से भी सूक्ष्म समय का शुभाशुभ-भविष्य-ज्ञान-प्रतिपादक फलित ज्योतिष का नाम ताजिक ज्योतिष है।
आचार्य नीलकण्ठ ने सन् 1587 में ताजिक नौलकण्ठी की रचना तीन तन्त्रों-प्रथम संज्ञातत्र, द्वितीय वर्षतन्त्र, तृतीय प्रश्नतन्त्र में की थी।
1. संज्ञातन्त्र में: राशियों का दिग्देश स्वरूपादि वर्णन, किसी भी नवीन वर्ष प्रवेश का सूक्ष्म समय-ज्ञान द्वारा वर्ष-कुण्डली ज्ञान, ग्रहों के अनेक प्रकार के बलों का अथवा परस्यर की दृष्टियों का विचार किया गया है। इसी तन्त्र में वर्षभर में प्राप्त होनेवाले इन्थशाल इक्कवाल-इन्दुवारादि सोलह योगों का विवेचन, मुंधहा ग्रह पर विशेष विचार तथा पुण्य-यश-गुरुज्ञान-माहात्म्य आदिक 38 सहमों का ज्ञान एवं तद्नुसार फलादेश का विवेचन हुआ है।
2. वर्षतन्त्र में: वर्ष-मास दिनेशादि ग्रह-निरूपण, प्रथमादि द्वादश भावों का फल-विचार, दशाक्रम व विचार के साथ राजाओं के आखेट भोजन स्वप्न आदि अनेक विषयों पर प्रकाश डाला गया है।
3. प्रश्नतन्त्र मेंः ग्रहों की अवस्था, स्वरूप, जय, पराजय, शरीर, रोग, धन, पुत्र, स्वी, आयु तीर्थागमन, विदेशगमन, पद-प्राप्ति, नष्ट द्रव्यज्ञान, राजभय, बन्धन, मोक्ष, क्रय-विक्रय प्रभृति अनेक प्रश्नों का प्रश्न लग्नानुसार विचार किया गया है।
राष्ट्रभाषा 'हिन्दी' में हरिनेत्रवल्लभा व्याख्या सरल, सुगम और स्पष्ट है। पाठकों के लिए अतीव
उपयोग होगी।
पण्डित परम्परा के ज्योतिर्विदों की वंशावली से संसेवित 'जुनायल' ग्राम (अल्मोड़ा) में जन्में, अपने पूज्य पिता पंडित हरिदत्त ज्योतिर्विद् से यथोचित ज्योतिष एवं शाक्त तथा तन्त्र शास्त्र का आपने अध्ययन किया। तदनन्तर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ग्रहगणित एवं फलित ज्योतिष दोनों विषयों में ज्योतिष शास्त्राचार्य की उपाधि प्राप्त कर ब्रह्मर्षि महामना पूज्य पंः मदनमोहन मालवीय जी के सम्पर्क में रहते हुए, प्राच्य विद्या संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 1938-1975 ई० तक अध्यापन कार्य करते हुए अवकाश ग्रहण किया। वार्धक्य होने पर भी आप ग्रहगणित-शोध कार्य, ग्रन्थ-लेखन और धार्मिक-सामाजिक कार्यों में संलग्न रहे।