Description
श्रीमती डॉ. चन्द्रा चतुर्वेदी जी के द्वारा प्रणीत 'वैष्णव आगम के वैदिक आधार' शीर्षक ग्रन्थ को प्रतिष्ठान के द्वारा प्रायोजित ग्रन्थमाला में सम्मिलित करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है। इस ग्रन्थ का प्रणयन प्रतिष्ठान की अध्येतावृत्ति के अन्तर्गत हुआ है, यह तथ्य भी हमारे परितोष का एक बड़ा कारण है।
ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण में विष्णु को वैदिक देवमाला में शिखरस्थ स्थान प्रदान किया है। कहा गया है कि अग्नि प्रथम देव हैं और विष्णु परम -
अग्निर्वै देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण अन्याः सर्वा देवताः।
वैदिक वाङ्मय में वैष्णव तत्त्वज्ञान का अपना विशिष्ट महत्त्व है। ऋग्वेद के विष्णु सूक्तों में ही विष्णु के वैशिष्ट्य का प्रकटीकरण प्रारम्भ हो गया है। विष्णु का अपना विशिष्ट धाम (लोक) है, जिसकी महिमा-गरिमा स्वर्ग से भी अधिक है। आगे चलकर पुराणों में यही धाम वैकुण्ठ धाम के रूप में प्रतिष्ठित दिखलाई देता है। वैखानस अथवा औरवेय शाखा का विकास वैष्णव दृष्टि का ही परिणाम है, जिसका अपना सम्पूर्ण कल्प-साहित्य है। यजुर्वेदीय काण्वशाखा की परम्परा भी वैष्णव-समाज में ही बद्धमूल हुई। आगम-साहित्य में पाञ्चरात्र आगम भी वैदिक विष्णु की विशेषताओं से ही ओतप्रोत है। वैदिक तत्त्वचिन्तन में वैष्णव जीवन-दृष्टि का सबसे बड़ा योगदान यज्ञों में अनावश्यक पुशहिंसा का निवारण है। वास्तविक पशु के आलभन के स्थान पर पिष्ट पशु (आटे के पशु) का समावेश वैष्णवों के ही प्रयत्न से सम्भव हो सका। ऐसी स्थिति में किसी का यह कथन कि विष्णु अथवा नारायण अवैदिक देव हैं, उसकी अल्पज्ञता का ही द्योतक है।
श्रीमती डॉ. चतुर्वेदी का यह ग्रन्थ वैष्णव परम्परा के वैदिक आधार की गहन गवेषणा का प्रस्तावक है। लेखिका ने अत्यन्त मनोयोग और अध्यवसाय से इस कार्य को सम्पन्न किया है। वैष्णव