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कुषाणकालीन अर्थव्यवस्था -Kushanakaleen Arthavyavastha(2009)

Publisher: Maneesha Publication
Language: Hindi
Total Pages: 82
Available in: Hardbound
Regular price Rs. 450.00
Unit price per
Tax included.

Description

भूमिका

अर्थव्यवस्था में शासन की आय, जनसाधारण की आय और तत्सम्बन्धी क्रिया-कलाप आदि सभी शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त जनता के कृषि, शिल्प, आवागमन, व्यापार (व्यापार से जुड़ी विभिन्न मौद्रिक, सामाजिक और धार्मिक इकाईयाँ) तथा उनके बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध आदि भी आर्थिक क्रिया-कलापों में शामिल होते हैं।

प्राचीन भारतीय वांगमय में एक आदर्श भारतीय की हिन्दू जीवन पद्धति में चार पुरूषार्थों की प्राप्ति को ही जीवन का परम ध्येय बताया गया है। उनमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरूषार्थ मनुष्य को बड़ी आसानी से मिल सकते हैं। यदि वह अर्थ नामक पुरूषार्थ में सफल होता है।

निःसन्देह अर्थ और अर्थव्यवस्था मानव समाज की आधारशीला है। धर्म और समाज की मान्यताएँ भी इसी अर्थव्यवस्था पर आश्रित रहती हैं और प्राचीन भारत के सुखी और सहज जीवन में अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा हाथ है।

प्राचीन भारतीय समाज भी आज की ही भाँति कृषि प्रधान समाज था और उसी प्राचीन भारतीय समाज के अध्ययन का विषय जब कुषाण काल को बनाया गया, तो वहाँ भी हमें यही दृश्य दिखाई पड़ता है। जीवन-यापन के लिए जनसाधारण का बहुत बड़ा हाथ पशुपालन एवं कृषि से जुड़ा था, लेकिन महत्वपूर्ण वैश्य व्यापार में केन्द्रित रहने लगे। यह वर्ग व्यापार से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता था और अपने व्यापार का विकास भी करता था। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का अस्तित्व था और विदेशी व्यापारियों को भारतीय शासकों द्वारा संरक्षण भी दिया जाता था। कुषाणकालीन भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब-करीब वे ही सारी गतिविधियाँ शामिल हैं, जो ईसा की आरम्भिक शताब्दियों में हुआ करती थीं।

इस समय विदेशी जातियाँ भारत की ओर बढ़ रहीं थीं। इनमें से कुछ लोग मध्य एशिया, उत्तर-पश्चिमी चीन इत्यादि जगहों से आ रहे थे। इनके आने से समुद्र से घिरे दक्षिण के क्षेत्रीय तटों से व्यापारिक प्रक्रिया शुरू हो गई। यद्यपि समुद्री व्यापार के

1.

अच्युतानन्द घिल्डियाल-प्राचीन भारत की सामाजिक संस्थाएँ, वाराणसी, 1973, पृ.सं.72