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  • Pracheen Misra Me Bhartiya Sanskriti (2007) - Motilal Banarsidass author
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Pracheen Misra Me Bhartiya Sanskriti (2007)

Publisher: Aravali Books International Pvt. Ltd.
Language: Hindi
Total Pages: 92
Available in: paperback
Regular price Rs. 525.00
Unit price per
Tax included.

Description

पाश्चात्य मानदंडों के अनुसार भारत के इतिहास की शुरूआत सिंकदर कें आक्रमण से कुछ सौ वर्ष पूर्व प्रारंभ होती है। इसी के आधार पर भारतीय इतिहास घिसट. घिसट कर किसी प्रकार गौतम बुद्ध के काल तक जा पाता है। उसके पूर्व इतिहासकारों के अनुसार अंधकार-युग है। (क्योंकि ईसा पूर्व की तिथियां उपलब्ध नहीं है)। मेरे बच्चे ने एक बार मुझसे एक पहेली बूझने को कहा। उसने पूछा- 'पापा, भारत में ऐसे सिक्के तो मिल जायेंगे जिन पर सन् लिखा रहता है, लेकिन क्या कोई ऐसा सिक्का भी है जिस पर ईसा पूर्व वर्ष लिखा हो?'

उपरोक्त पहेली उन तथाकथित इतिहासकारों पर हल्की-सी धौल है जो प्राचीन इतिहास की प्रत्येक सामग्री को ईसापूर्व से तोलना चाहते हैं।

अक्सर लोग हरिद्वार और कुरूक्षेत्र जाते हैं। ये स्थल हिंदुओं के प्राचीन तीर्थ-स्थान हैं। हरिद्वार में मृत व्यक्तियों की अस्थियां भी प्रवाहित की जाती हैं। इसी दौरान लोग अपने कुल-पुरोहित को ढूंढते हैं और उसकी बही में अपने परिवार के विषय में जानकारी दर्ज करवा देते हैं। यह क्रिया हिंदुओं के लिए एक प्रकार की आवश्यक परंपरा है। कई अन्य लोग हरिद्वार या कुरूक्षेत्र सैर-सपाटे के लिए भी जाते हैं। मैं भी एक बार परिवार के साथ हरिद्वार घूमने चला गया। अपने परिवार का इतिहास जानने की मेरी प्रबल इच्छा हुई। मैंने किसी से पूछा कि पंडे कहां बैठते हैं? उसने इशारा कर दिया, 'वहां'! मैनें अपना कुल-नाम बताया तो पंडे ने पूर्वजों का स्थान पूछा, और एक पंडित के पास भेज दिया। पंडित जी ने पांच मिनट में ही बही-खाते देखकर मुझसे कहा - "आप अपने दिमाग पर और जोर डालिये। आपके पूर्वजों का स्थान वह नहीं है जो आप बता रहे हैं।" अचानक मुझे एक और स्थान का नाम याद आ गया। पंडित जी ने चार-पांच मिनट का समय और लिया और मेरे आगे बही खोल कर रख दी। मेरे स्वर्गीय पिता, मेरी मां और मेरे बड़े भाई साहब (सुप्रसिद्ध शायर श्री 'मासूम') के साथ वहां सन् 1929 में घूमने आए थे। तब भाई साहब की आयु मात्र एक वर्ष के लगभग थी। पिताजी ने परिवार के विषय में अन्य वृत्तांत भी लिखा हुआ था। स्पष्ट था कि मैं भारत की लगभग एक सौ करोड़ की आबादी की भीड़ में खोया हुआ इंसान नहीं हूं। मेरा इतिहास, मेरी जीवनी, मेरे पूर्वजों का वृत्तांत पुस्तकों में दर्ज है, जिसे मेरे बाद की पीढ़ियां भी पढ़ सकती हैं। यहां 'मेरा' शब्द से ताप्तर्य मुझसे नहीं, बल्कि सभी भारतवासियों से