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  • तीर्थंकर महावीर - Teerthankar mahaveer (2007) - Motilal Banarsidass author
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तीर्थंकर महावीर-Teerthankar mahaveer (2007)

Publisher: Shri Amol Jain Gyanalaya
Language: Hindi
Total Pages: 299
Available in: Paperback
Regular price Rs. 300.00
Unit price per
Tax included.

Description

प्राक्कथन

(प्रथम आवृत्ति से)

तीर्थंकर श्रमण भगवान महावीर एक व्यक्ति नहीं, विश्वात्मा है, विश्वपुरुष है। व्यक्ति क्षुद्र है वह देश और काल की सीमाओं में अवच्छिन्न है अतः वह अनन्त नहीं हो सकता। महावीर अनन्त हैं, उनका प्रकाश शाश्वत है। वह काल की सीमाओं को धकेलता हुआ अनन्त की ओर सतत गतिशील रहेगा।

भगवान महावीर का प्रबोध उभयमुखी है। वह जहां एक ओर अन्तर्जगत् की सुप्त चेतना को प्रबुद्ध करता है, वहां दूसरी ओर समाज की मोह निद्रा को भी भंग करता है। महावीर ने साधक की अन्तरात्मा को जागृत करने के लिए वह आध्यात्मिक चिन्तन दिया है, जिसकी ज्योति कभी धूमिल नहीं होगी। यह वह ज्योति है, जो जाति, कुल, पंथ और देश आदि के किसी भी वर्ग विशेष में आबद्ध नहीं हैं। चिन्तन के वह संकरे गलियारों में न घूमकर सीधे आत्मतत्त्व को स्पर्श करती है। यह महावीर का ही मुक्त उद्घोष है कि हर आत्मा मूलतः परमात्मा है। क्षुद्र-से-क्षुद्र प्राणी में भी अनन्त चौतन्य ज्योति विद्यमान है। अपेक्षा है ऊपर के अज्ञान मोह, राग-द्वेष आदि कर्मावरणों को तोड़ देने की। इस प्रकार महावीर का ईश्वरत्व प्राणि मात्र का है, किसी एक व्यक्ति विशेष का नहीं।

महावीर का प्रबोध केवल धर्म परम्पराओं के आध्यात्मिक तत्त्व बोध तक की परिसीमित नहीं है। उनका दर्शन जीवन के विभाजन का दर्शन नहीं है। वह एक अखण्ड एवं अविभक्त जीवन दर्शन है। अतः उनका प्रबोध आध्यात्मिक धर्मक्रान्ति के साथ सामाजिक क्रान्ति को भी तथ्य की गहराई तक छूता है। भगवान महावीर का सामाजिक क्रान्ति का उद्घोष चिर अतीत से बन्धनों में जकड़ी मातृ जाति को मुक्ति दिलाता है, उसके लिए कब के अवरुद्ध विकास पथ को खोल देता है। उस युग को दास प्रथा कितनी भयंकर थी? दासों के साथ पशु से भी निम्न स्तर का व्यवहार किया जाता था। मानवता के नाम पर उनका धार्मिक, नैतिक या सामाजिक कोई भी तो मूल्य नहीं था। महावीर का क्रान्ति स्वर दास-प्रथा के विरोध में भी मुखरित होता है। वे अनेक बार सामाजिक परम्पराओं के विरोध में जाकर पद-दलित एवं प्रताड़ित दासियों के हाथ का भोजन भी लेते हैं। जाति और कुल के जन्मना श्रेष्ठत्व के दावे को भी उन्होंने चुनौती दी। जन्म की अपेक्षा कर्म की श्रेष्ठता को ही उन्होंने सर्वोपरि स्थान दिया है। उनके संघ के हरिकेश जैसे अनेक चाण्डाल आदि निम्न जाति के शिष्य थे, जिनके सम्बन्ध में उनका कहना था कि जाति की कोई विशेषता नहीं है, विशेषता है सद्गुणों जिसके फलस्वरूप देवता भी चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं।