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  • श्रुतसागर की मनियां - Shrutsagar ki maniyan (2001) - Motilal Banarsidass author
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श्रुतसागर की मनियां-Shrutsagar ki maniyan (2001)

Publisher: Anekant Foundation
Language: Hindi
Total Pages: 336
Available in: Hardbound
Regular price Rs. 750.00
Unit price per
Tax included.

Description

भगवान महावीर स्वामी ने श्रुत-ज्ञान की महिमा बताते हुए फरमाया है-

जहा से सयंभूरमणए उदही अक्खओदए।

नाणा-रयण पडिपुण्णे एवं हवइ बहुस्सुए।।

जिस प्रकार स्वयंभूरमण समुद्र (पृथ्वी पर सबसे बड़ा समुद्र) अक्षय जल से परिपूर्ण रहता है, अनेक प्रकार के मूल्यवान मणि-रत्त्नों से भरा रहता है, उसी प्रकार शास्त्रों का ज्ञानी बहुश्रुत भी ज्ञान रूपी अक्षय मणियों से परिपूर्ण रहता है।

भगवान ने श्रुत ज्ञान रूप-शास्त्रों को भी क्षीर समुद्र की उपमा दी है और शास्त्रों के मर्मज्ञ बहुश्रुत मुनि को भी क्षीर समुद्र के समान बताया है।

जिनवाणी का प्रत्येक वचन, प्रत्येक आगम गम्भीर अर्थ रहस्यों से परिपूर्ण है। उनमें जीवन का शाश्वत सत्य छिपा है, कल्याण का अमर सन्देश मुखरित है। आगमों में भी स्थानांग सूत्र जो तीसरा अंग आगम है, अपनी विशिष्ट रोचक शैली और विविधता के कारण अत्यधिक रोचक और जीवन सत्यों का उद्घाटक विशिष्ट आगम है। मैंने जब इस आगम का दूसरी बार अध्ययन किया, तो इसके अर्थ पदों पर धीरे-धीरे शान्तिपूर्वक चिन्तन करता रहा। इसके सूत्र पाठ आकार में बहुत छोटे-छोटे हैं किन्तु अपने आप में पूर्ण पाठ हैं। स्वतंत्र पद हैं, उनमें नाना प्रकार के विषयों का समावेश है। संसार का शायद् ऐसा कोई विषय नहीं रहा होगा जिसकी सूत्र रूप में चर्चा इस आगम में नहीं मिलती हो। चाहे तत्त्व ज्ञान हो, या ज्योतिष, मंत्र-तंत्र-समुद्र, भूगोल, स्वर्ग, नरक, जीव, कर्म, पुद्गल, पृथ्वी, वनस्पति, परमाणुः भौतिक ज्ञान, जीवविज्ञान, काम-विज्ञान और मनोविज्ञान आदि सभी विषयों की चर्चा इस सूत्र में मिलती है। हाँ, चर्चा केवल सूत्र रूप में संक्षेप में है, जब तक उस पर चिन्तन-मनन नहीं किया जाये, तब तक उसका रहस्य और उसकी प्रेरणा का ज्ञान कर पाना कठिन है।

जिस प्रकार फूलों के उद्यान में घूमने पर उसमें भिन्न-भिन्न जाति के, भिन्न-भिन्न रंग रूप के सुन्दर से सुन्दर फूलों की सौन्दर्य छटा दीखती है।