Description
प्रस्तावना
श्री विजय वल्लभ स्मारक प्रणेता, काँगड़ातीर्थोद्धारिका तथा लहरा गुरुधाम तीर्थ प्रेरिका- महत्तरा जैन भारती साध्वी श्री मृगावती श्री जी महाराज का संपूर्ण जीवन अपने आप में परम तेजस्वी और प्रतिभा सम्पन्न बना रहा है।
सन् 1954 में पंजाब केसरी श्री गुरु वल्लभ की आज्ञा शिरोधार्य करके महत्तरा श्री जी, अपनी माता-गुरु साध्वी श्री शीलवती श्री जी म० तथा सुशिष्या साध्वी श्री सुज्येष्ठा श्री जी म० के साथ पंजाब में आए। और यहां की भूमि के कण कण व जन जन से एकमेक हो गए। समाज के पटल पर किये गए सफल प्रयोगों की वजह से वे एक अनोखी देन बन गए और उनकी गुणात्मक सुवास पूरे भारत में फैली गई।
गीतों-भजनो के रचनाकार कवियों व संगीत-प्रेमियों ने समय समय पर, उनके महान कार्यों, उपलब्धियों व उपकारों को कलमबंद करके अनेक भजन, गीत, टप्पे व नृत्य गीत आदि हिंदी व पंजाबी भाषा में रचे, जिनकी सुकोमलता व सुगंध आज भी ताज़ा है। भाव और शब्दावलि का बेहतर सामंजस्य होने से इन भजनों में छिपी हुई एक ऐसी आवाज़ है जो रुह से निकलती है और जिसे रुह ही सुना करती है। सुनने की ललक पैदा होती है।
महत्तरा मृगावती श्री जी स्वयं भी कवि-हृदय व संगीत प्रेमी थे। मीरा, कबीर, आनंदघन, यशोविजय व गुरू आतम के भक्ति