Description
श्री जतनलाल रामपुरिया की कृति उजाले का अपहरण समय-समय पर लिखे गए निबंधों का संग्रह है, जिसमें लेखक ने विद्यमान समय की विसंगतियों को मार्मिकता के साथ अभिव्यक्ति दी है। रामपुरिया जी के लेखों को पढ़ने पर मुझे उनमें एक संवेदनशील नागरिक का दर्शन होता है, जो आधुनिक परिवेश में अनवरत रूप से घट रही घटनाओं की विद्रूपताओं से मर्माहत है। जिस भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बारे में देशवासियों के मन में हमेशा गौरव-बोध रहा है, वह संस्कृति किस कदर सिरे से गायब हो रही है और उसकी जगह एक निहायत विशृंखलित, स्वार्थपरक और मूल्यविरोधी संस्कृति पैदा हो रही है, इसकी ओर लेखक ने पूरी ईमानदारी एवं तटस्थता के साथ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। लेखक द्वारा उठाए गए अधिकांश मुद्दे हमारे जीवन से सीधे सरोकार रखते हैं।
रामपुरिया जी ने इन लेखों में समाज, राजनीति और धर्म तीनों क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों, दिशाहीन सोच, असंगत कार्यप्रणालियों, अराजक स्थितियों, विमूढ़ता और अन्धविश्वास से भरे आचरणों (धर्माचरणों), व्यवहारों पर पूरी संजीदगी और सत्यान्वेषी दृष्टि से विचार किया है। प्रायः सभी लेखों में घटनाओं को सूत्र रूप में प्रारंभ किया गया है जिनका क्रमशः विकास होता गया है और उसकी परिणतिं एक ऐसी स्थिति में होती है, जो अन्तर्मन को झकझोर कर रख देती है। मेरी राय में साहित्य के प्रयोजनों का प्रस्थान बिंदु यही है। निबंधों में उठाए गए मुद्दे अत्यंत प्रासंगिक और व्यापक स्तर पर समाज को प्रभावित करने वाले हैं और उनका दूरगामी प्रभाव चौंकाने वाला सिद्ध हो सकता है।
लेखक की चेष्टा विभिन्न घटनाओं के माध्यम से आजादी के बाद, खासकर पिछले दस वर्षों की कालावधि में देश के सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक क्षेत्रों में आए बदलाव, भ्रष्टाचार, दुराचार आदि के साथ ही कुछ मूलभूत मुद्दों की ओर, जिनमें धार्मिक मुद्दे भी शामिल हैं, पाठकों का ध्यान आकर्षित करने और सर्वत्र व्याप्त क्रूरता, हिंसा, बीभत्सता, जुगुप्सा, हफ्तावसूली, अपहरण, हत्या, फरेब, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, निर्बल कानून व्यवस्था, पंगु प्रशासन, समाज में व्याप्त