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  • शब्दों के मोती- Shabdon ke Moti (Purvardh) (2002)
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शब्दों के मोती- Shabdon ke Moti (Purvardh) (2002)

Publisher: Jain Adhyayan Evam Siddhant Shodh-Sansthan
Language: Hindi
Total Pages: 84
Available in: Hardbound
Regular price Rs. 375.00
Unit price per
Tax included.

Description

नानारूपात्मक इस विश्व से एकात्मक होकर 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम्' को वर्ण और वाक् दोनों में बाँधने की कला कवि में विद्यमान होती है। काव्य को चित्रमय और चित्र को काव्यमय बनाने की अद्भूत क्षमता रखने वाला कवि वर्तमान जीवन को कविता में स्थान देता है। सम्पूर्ण जीवन में प्राप्त अपने अनुभवों से वह कल्पना की ऊँची उड़ान भरकर शब्दों में संगीत भरता है। कवि के विश्राम क्षणों का प्रतिबिम्बक होती है कविता। छायावादी कवियों के भावपक्ष के साथ-साथ जिस स्वच्छन्दता की प्रवृत्ति काव्य में प्राप्त होती है, उससे यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि कलाकार के अन्तस् का वैभव और बाह्य वैभव दोनों कविता को प्रभावित करते हैं। महादेवी वर्मा ने छायावादी कवियों के विषय और विधान का जो विचार प्रस्तुत किया, उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार कहा गया है- "विषय पर कोई कला निर्भर नहीं रहती। सच्चे चित्रकार की तूलिका भगवान् बुद्ध की चिर शान्त मुद्रा अंकित करके भी धन्य हो सकती है और कन्धे पर हल लेकर घर लौटने वाले कृषक का चित्र बनाकर भी वह अमर हो सकती है। काव्य, चित्र और संगीत तीनों के सम्बन्धों पर उक्त विचारों की समीक्षा करें तो स्पष्ट हो जाता है कि काव्य के साथ चित्रकला का यह तादात्म्य स्वच्छन्दतावादी आन्दोलन का परिणाम नहीं, बल्कि भारतीय परम्परा का सहज विकास है।

भावनाओं और अनुभवजन्य प्रवृत्तियों के संयोग से कविता का सृजन होता है। कवि अपने विचारों में आदर्श और यथार्थ का अद्भुत संतुलन बैठाकर मानव वेदना-संवेदना के उदात्त शिखरों का रूपायन अपने काव्यों में करता है। हिन्दी साहित्य के अतिआधुनिक साहित्य का अवलोकन करके हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इन कवियों में यद्यपि विषय वैविध्य तो दिखाई पड़ता है, किन्तु भाषा की प्रौढ़ता, भावों की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति और अर्थगाम्भीर्य से अनुप्राणित ये कबिताएँ यथार्थ के धरातल पर टिकी हुई हैं।

'शब्दों के मोती' इस काव्य-संग्रह में यदि आधुनिक कविता का