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  • विद्वनमोद तरंगिणी-Vidvanmod Tarangini (1991)
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विद्वनमोद तरंगिणी-Vidvanmod Tarangini (1991)

Shiv Singh Saroj ka Adyavadhi aprakashit Prasiddh Aadhar Granth
Publisher: Hindi Sahitya Sammelan Prayag
Language: Hindi
Total Pages: 368
Available in: Hardbound
Regular price Rs. 675.00 Sale price Rs. 900.00
Unit price per
Tax included.

Description

'विद्वन्मोद तरंगिणी' शिर्वासह सरोज के आधार-ग्रन्थों में परिगणित होती है। इसका नाम तो बहुत पहले से सुनता रहा, पर इसे देखने का सुयोग मुझे सन् १६५९ के जून मास में मिला। यह ग्रन्थ डॉ० लक्ष्मीधर मालवीय 'देव ग्रन्थावली' के पाठों पर अनुसंधान करते समय देव के अन्यान्य ग्रन्थों के साथ सीतापुर से लाये थे और मुझे उन्हीं के द्वारा हस्तगत भी हुआ था। ग्रन्थ को मैंने एक वर्ष तक अपने पास रखा और जब १६६० में डॉ० भगवती प्रसाद सिंह द्वारा संपादित होकर 'दिग्विजय भूषण' प्रकाशित हुआ तभी मेरे मन में भी इसके संपादन की उत्कट ललक उत्पन्न हुई थी। उस समय इस ग्रंथ की अन्य पाण्डुलिपियों के अभाव में संपादन की लालसा पूरी न हो सकी थी। आज संपादन के इस कार्य को पूरा कर लेने पर मुझे परम संतोष हो रहा है, कारण यह है कि सरोज के अन्यान्य आधार-ग्रन्थों में इसका महत्त्व कम नहीं है और ऐसे संदर्भ-ग्रन्थ के चचित होने पर भी हिन्दी-जगत् लाभ नहीं उठा सका था। अब मुझे विश्वास है कि अद्यावधि अप्रकाशित इस दुर्लभ संग्रह-ग्रन्थ से हिन्दी के रसिक, सहृदय और शोधार्थियों को पुराने इतिहास की अनेक उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने में पर्याप्त सहायता मिलेगी।

आकर ग्रन्थमाला के मूर्द्धन्य विद्वान् स्व० आचार्य विश्वनाथप्रसाद जी मिश्र ने अनेक प्राचीन ग्रन्थों का संपादन अकेले अपने बलबूते पर कर डाला और जिसे बड़ी-बड़ी संस्थाएँ भी नहीं करवा सकीं, उसे पण्डित जी मृत्युपर्यन्त स्वतः अप्रतिहत गति से सम्पन्न करते रहे- यह हमारा दुर्भाग्य है कि ऐसे मनीषी की ऐसी सारस्वत साधना में हम प्रायः योगदान करने के बजाय पराङमुख ही होते रहे और पुराने ग्रन्थों के संपादन के नाम पर खिल्ली उड़ाते रहे तथा उपहास करते रहे। लाला भगवानदीन की संपादन विषयक पुरानी शैली, डॉ० माताप्रसाद गुप्त की वैज्ञानिक शैली और आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र की वैज्ञानिक एवं साहित्यिक शैलियों द्वारा सुसम्पश्न पुराने ग्रन्थों के संपादन कार्य की परम्परा उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है दृष्टि मंद होती जा रही है-आलोचना और नयी कविता के इस युग में प्राचीन काव्य 'आउट ऑफ डेट' होता जा रहा है। जो एक ओर ब्रजभाषा के कवित्त-सवैयों की सरसता और मादकता का दम भरते हैं, वे ही दूसरी ओर नयी कविता की सपाट बयानी की जमकर वकालत करते हैं- मूल को छोड़कर व्याज से महाजनी वृत्ति का संपोषण कब तक होगा और रचनामिता और साहित्य सर्जना के पुनीत आदर्श को ग्रहण करके कथ तक उनकी चमगादड़ी नीति कार्यान्वित होती रहेगी? एक समय ऐसा भी आया जब पण्डित सुमित्रानन्दन पन्त ने केशव, बिहारी और देव की 'पल्लव' की भूमिका में अनेक प्रकार से आलोचना की और