Description
संस्कृत ग्रंथ भारत की मूल संस्कृति का स्रोत है, अतः अन्य विषयों के साथ-साथ इस भाषा का ज्ञान प्रत्येक राष्ट्र-भक्त भारतीय के लिए उपादेय है। संस्कृत पढ़ने के इच्छुक पाठकों के लिए अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों की रच-नायें हिन्दी तथा अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। उन सबका अपना-अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है और वे सभी पाठकों के लिए आज भी उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। अतः उन पुस्तकों के लेखक संस्कृत की सेवा के कारण हमारी कृतज्ञता के पात्र हैं।
परन्तु इन रचनाओं के माध्यम से संस्कृत भाषा का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करते-करते एक-दो वर्ष तो लग ही जाते हैं। उस पर भी 'सांस्कृतिक पक्ष' अध्येता पर उतना प्रखर रूप से प्रभावी नहीं होता। मैं चाहता था कि कोई ऐसी पुस्तक बने जिसके माध्यम से विद्यार्थी कम से कम समय में सरलता से संस्कृतविद् भी बन जाएं और साथ साथ संस्कृति के मूल तत्त्वों जैसे, सदाचार, अहिंसा, नीति, परोपकार आदि (देखें परिशिष्ट-१) गुणों को भी आत्मसात् कर सकें ।
विहंगम दृष्टिपात करने पर इन उद्देश्यों की पूति के लिए आज भी मुझे, भाषा, शैली तथा विषय-वस्तु की दृष्टि से "हितोपदेश" ही उत्कृष्ट प्रतीत होता है। अतः उस के गम्भीर अध्ययन के पश्चात् आज के जीवन की आवश्यकता के अनुसार उसका सरल संक्षिप्त संस्करण प्रस्तुत किया जा रहा है।
भूमिका के रूप में, संस्कृत भाषा में सुगमता से प्रवेश पाने के लिए बारम्भ में सूक्ति-परक चार पाठ अर्थ सहित दे दिये हैं। तत्पश्चात् संस्कृत-व्याकरण के अत्यन्त उपयोगी नियम सूत्र रूप में लिख दिये हैं। इन दोनों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लेने के पश्चात् ही विद्यार्थी अधिक विश्वास और उत्साह के साथ आगे बढ़ेंगे ऐसी आशा है क्योंकि-
'चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान् ।'
बुद्धिमान् को एक पैर पूरी तरह जमाकर ही दूसरा उठाना चाहिए ।
शब्द-कोशः में 'संक्षेप' को ध्यान में रखकर मूल शब्द के आरम्भिक वर्षों से काम लिया गया है। जैसे श्लोक १७ के आगे मरु० का अर्थ है- मरुस्थल्यां श्लोक २३ अव० अवलम्ब्य, इत्यादि । हमारा पूर्ण विश्वास है कि इस पुस्तक में लगभग २०० श्लोकों को हृदयंगम और कंठस्थ कर लेने वाला व्यक्ति अपने विचारों और कर्म में आमूलचूल परिवर्तन का अनुभव करेगा तथा अन्य सरल संस्कृत रचनाओं को किसी अच्छे अनुवाद की सहायता से स्वतन्त्र रूप से पढ़ सकने में समर्थ हो जाएगा।
अज्ञान अथवा प्रमादवश पुस्तक में रह गई मुद्रण की या अन्य अशुद्धि यों और न्यूनताओं के लिए हमें खेद है। विज्ञ पाठकों के संशोधनार्थ सुझावों का स्वागत है।