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कर्म कौमुदी: Karma Kaumudi

Publisher: Nag Publishers
Language: Sanskrit
Total Pages: 222
Available in: Hardbound
Regular price Rs. 750.00 Sale price Rs. 900.00
Unit price per
Tax included.

Description

प्राचीन वैदिक काल से ही कर्म की महत्ता रही है। सायण के अनुसार वेद के सभी मन्त्रों का विनियोग यज्ञ में विहित है। यज्ञ ही कर्म है। कालान्तर में वैदिक यागों का स्वरूप विखण्डित होकर लघु रूप में समाज में दृष्टिगत हुआ और गृहस्थाश्रम के अन्तर्ग विभिन्न अनुष्ठान तथा संस्कारादि प्रचलित हुए। ये सभी कर्म वैदिक गृह्यसूत्रों के द्वारा प्रचलित हुए तथा आगम परम्परा के अभ्युदय से इन अनुष्ठानों में आगमोक्त और तन्त्रोक्त विधियों का सन्निवेश हुआ। पूजनादि कृत्यों में वैष्णवः शैक शाक्त तथा स्मार्त आगमों के अनुसार भेद दृष्टिगत होता है। एक आगम के अन्तर्गत भी अनेक आगमों का सूत्रपात देखा जाता है यथा वैष्णव आगम में वैखानस तथा पाञ्चरात्र आगम पृथक्तया अपनी कर्मपद्धति प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुत पुस्तक पारस्कर गृह्यसूत्र (शुक्ल यजुर्वेदीय) तथा स्मातीगम की मिश्रित परम्परा पर आश्रित है। कर्मकाण्ड के बोझिल स्वरुप में सारल्य की कामना से यत्र तत्र लेखक के द्वारा समासीकरण भी किया गया है। इस पुस्तक में निव्य नैमित्तिक, पूजाहोम, अनुष्ठानशान्ति, संस्कार, गृहकर्म तथा पुराणपारायणव्रतादिकाम्य कर्मों का सविधि विवरण प्रस्तुत किया गया है। अल्प संस्कृत ज्ञाता भी इस पुस्तक को पढ़कर एक कुशल पुरोहित बन सकता है। पुस्तक के अन्त में परिशिष्ट भाग के अन्तर्गत सामान्य ज्योतिषविषयक जानकारी तथा कर्मकाण्ड में प्रयुक्त सर्वतोभद्रादि मण्डलों के चित्र भी प्रस्तुत किये गये हैं, जिससे इस विषय को समझने में अति सरलता होगी।