Description
ग्रन्थ- परिचय
'कुण्डरत्नावली' सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के विश्व-प्रसिद्ध सरस्वतीभवन पुस्तकालय के हस्तलिखित पाण्डुलिपि को विधिवत् सम्पादित कर प्रकाशित किया गया है। इस ग्रन्थ की रचना रामचन्द्र दीक्षित द्वारा १७९० शकाब्द के भाद्रपद कृष्णपक्ष की एकादशी को श्रीकाशी विश्वेश्वर की सन्निधि में पूर्ण की गयी थी। यह ग्रन्थ श्री दीक्षित की स्वोपज्ञ मञ्जूषा नामक संस्कृतटीका से समुपबृंहित है । ग्रन्थ तो मात्र १६५ श्लोकों में पूर्ण हुआ है। जो तेइस विविध छन्दों में रचित है। प्रयुक्त छन्दों की विवरणिका परिशिष्ट-३ में दिया गया है । ग्रन्थ की मञ्जूषा टीका अर्थ को पूर्ण रूप से विवृत करती है।
कुण्डरत्नावली में यज्ञ-कुण्डों के निर्माण - विधि को बताया गया है। जिससे प्राचीन ज्यामिति - शास्त्र का दिग्दर्शन होता है। कुण्डनिर्माण का प्रयोजन केवल हवन के लिए एक गर्त बनाना ही नहीं, इसका प्रयोजन उसके सभी कोणों के बीच में सम्बन्ध को समझ कर उसी प्रकार का सम्बन्ध मनुष्य एवं देवता के बीच में भी स्थापित करना है। ग्रन्थ में व्याख्यायित कुण्डों का स्वरूप परिशिष्ट - १ में दर्शाया गया है। वहाँ ग्रन्थ में वर्णित यज्ञ - कुण्डों की निर्माण विधि को सचित्र एवं ज्यामितीय रीति से प्रस्तुत किया गया है। आचार्य दीक्षित अपने कथ्य के प्रमाण में पग-पग पर प्राचीन आचार्यों की सम्मति प्रस्तुत किये हैं। जिससे ग्रन्थ की प्रमाणिकता की पुष्टि होती है। परिशिष्ट - २ में मूल ग्रन्थ की पाण्डुलिपि का कुछ अंश दिया गया है। इस ग्रन्थ में मृत ग्रन्थों एवं ग्रन्थकारों की सूची अन्त में परिशिष्ट- ४ में प्रस्तुत किया गया है। परिशिष्ट - ५ में श्लोकों की अनुक्रमणिका दी गयी है। जिससे ग्रन्थकार के बुद्धिवैभव की अनुभूति होती है। डॉ. मिताली देव की विस्तृत भूमिका तथा अनेक पाद- टिप्पणियों से ग्रन्थ की महत्ता पूर्ण परिनिष्ठित हो जाती है । संस्कृत मूर्धन्य विद्वानों की सम्मति एवं शुभाशंसा से ग्रन्थ का गौरव एवं महत्त्व सुस्पष्ट हो जाता है।
सारांश रूप में कथनीय है कि यह ग्रन्थ यज्ञ - कुण्डों के निर्माणविधि से सम्बन्धित प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराने में सहायक सिद्ध होगा।