Description
भारत की आन्तरिक एकता की आधारभूत व्यवस्था को परिवर्तित करने हेतु अनेक मनीषियों द्वारा प्रयास किया गया है। समाज परिवर्तन के मुद्दे को प्रधानता दिलाने वाले मनीषी डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का भारत के इतिहास में प्रमुख स्थान है। सामाजिक जीवन में उनका प्रवेश 20वीं के आसपास हुआ। इनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय समाज में सुधार के लिए समर्पित था। डॉ. अम्बेडकर उच्चकोटि के राष्ट्रभक्त और सामाजिक क्रान्ति के सूत्रधार और दलितों के मसीहा भी थे।
बाबासाहब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर एक प्रबुद्ध विचारक, न्याय के पक्षधर और स्पष्टवादी व्यक्ति थे। उनको शोषण उत्पीड़न व अन्याय के विरुद्ध समता, स्वतन्त्रता और बन्धुता जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना की प्रेरणा भगवान् बुद्ध, संत कबीर और ज्योतिबा राव फूले के जीवन दर्शन से प्राप्त थी। बाबासाहब ने धर्मान्तरण कर बौद्ध धर्म को अपनाया क्योंकि; बौद्ध धर्म सामाजिक असमानता को समाप्त कर बंधुत्व भाव विकसित करता है। उनका मानना था कि बौद्ध धर्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है और इससे न तो समाज को और न ही देश को किसी प्रकार का नुकसान होगा। वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक समस्याओं से व्यक्ति को मुक्ति मिलेगी।
वास्तव में यदि भारत को विश्वगुरू बनाना है तो जीवन के प्रत्यके क्षण समाज में सामाजिक समानता को विकसित करना होगा, अन्यथा केवल सामाजिक विचारधाराओं के बल पर मानवीय सुख की कल्पना नहीं कर सकते। समस्त विकृतियों, विषमताओं से मुक्त समाज व्यवस्था का मार्ग ही राष्ट्र कल्याण का मार्ग हो सकता है।
इस पुस्तक में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के सामाजिक चिन्तन के अन्तर्गत समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, अस्पृश्यता मानवाधिकार आदि विषयों पर आधारित लेखों का संकलन किया गया है। इस पुस्तक में वर्णित लेख