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कीर्त्तिपताका: Kirtipataka

Kirtipataka of Vidyapati
Publisher: Nag Prakashak
Language: Sanskrit
Total Pages: 139
Available in: Hardbound
Regular price Rs. 600.00 Sale price Rs. 750.00
Unit price per
Tax included.

Description

मैथिल-कोकिल महाकवि विद्यापति (१३६० से १४५० ई०) की कृति कीत्तिपताका काव्य मिथिलेश शिर्वासह द्वारा यवनों पर विजय की गद्य-पद्यात्मक वौरगाथा है। यह अवहट्ठ (मैथिल अपभ्रंश) भाषा में रचित है एवं इसके अनेक अंश प्राचीन मैथिली-भाषा में हैं। विद्यापति की कीत्तिलता से सभी सुपरिचित हैं। कीर्तिपताका की भाषा भी उसीके समान है। इसका एकमात्र हस्तलेख उपलब्ध हुआ, जिसके आधार पर प्रस्तुत संस्करण संशोधित एवं पूर्णपरिमार्जित रूप में संस्कृत-हिन्दी अनुवाद सहित हुआ है। इसके अर्थानुसन्धान से स्पष्ट हो जाता है कि कीत्तिपताका के हस्तलेख पोथी में तीन खण्डित ग्रन्थ मिले हुए हैं। इन तीनों को यहां 'कीत्तिपताका' नाम से एक साथ प्रकाशित किया गया है-
१. एक (अज्ञात-नाम) अवहट्ठ काव्य (केवल एक पत्र),
२. कोत्तिगाथा (विद्यापतिकृत अर्जुन राय की यशो--गाथा, शृङ्गार रस से ओतप्रोत कृष्णविलास जो तालपत्र-२ से ७ तक है)
३. कीत्तिपताका - आदि भाग खण्डित, पत्र ३० से ३८ तक ।
इन ग्रन्थों में प्रवाह्मय रसपूर्ण उत्कृष्ट सहज कवित्व के साथ अपभ्रंशकालिक भाषा का स्वरूप एवं अनेक ऐतिहासिक तथ्य सुरक्षित हैं जो इसकी विद्वत्तापूर्ण विस्तृत प्रस्तावना में सम्पादक द्वारा समौक्षित हैं ।
कीत्तिगाथा में मुग्धानायिका के मिलन का शृंगारिक वर्णन जैसा उत्कृष्ट है, वैसा वर्णन दुर्लभहै। इसके संस्कृत एवं अवहट्ठ गद्य सीधे बाणभट्ट से होढ़ लेने वाला है। इस काव्य में मध्ययुगीन अनेक परिवेशों की झाँकी देखी जा सकती है।