Description
पृथ्वी पर शिवलिङ्ग कितने हैं? इसकी गणना करना सम्भव नहीं है। यह सारा जगत् शिव जी का स्वरूप है। पृथ्वी में ही नहीं बल्कि पाताल व स्वर्ग में शिव के लिङ्ग हैं। सभी देवता, असुर व मनुष्य शिवजी की पूजा करते हैं। जहाँ कहीं भी भक्तों ने स्मरण किया, उनके कार्य को सिद्ध करने के लिए शिव जी वहाँ-वहाँ अवतरित होकर स्थित हुए। लोक कल्याण हेतु ही शिवजी लिङ्ग के रूप में प्रकट हुए।
प्रधान ज्योर्तिर्लिङ्ग जिनके स्मरण व दर्शन से व्यक्ति सब नापों से मुक्त हो जाता है, ये हैं सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में -ल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकाल, ॐकार में ओंकारेश्वर, हिमालय = केदारनाथ, डाकिनी में भीमशंकर, वाराणसी में विश्वेश्वर, गौतमी न्ट पर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुकावन में नागेश, नुबन्ध में रामेश्वर और शिवालय में घुष्मेश्वर। जो मनुष्य प्रातःकाल इन द्वादश नामों को स्मरण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। लोक-परलोक में उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं।
निष्काम भाव व शुद्ध चित्त से चिन्तन-मनन व पाठ करने से व सुनने से व्यक्ति मोक्ष को प्राप्न होता है, दुःखों का नाश होता है। इन ज्योतिर्लिङ्गों के फल को स्वयं ब्रह्मा जी भी नहीं कह सकते, साधारण मनुष्य के लिए उसका वर्णन करना सूर्य को दीपक दिखाना मात्र है। पुस्तक के सभी तथ्य शिव-पुराण व अन्य सम्बन्धित ग्रंथ से लिये गये हैं।