Description
भारतवर्ष में आनन्द प्रदान करने वाले घटक के रूप में सौन्दर्य नामक तत्त्व भी विवेचित रहा है। सौन्दर्य का अर्थ पाश्चात्य देशों में 'एस्थेटिक्स' के निकट है, जिसका हिन्दी रूपान्तरण 'सौन्दर्य-शास्त्र' है। सौन्दर्य मूलतः रस का पर्याय ही है। साहित्यशास्त्र शब्द के माध्यम से कला का सूचक है परन्तु सौन्दर्यशास्त्र ललित कलाओं के चारुत्व को अभिव्यक्त करता है। सौन्दर्यशास्त्र के जनक वामगार्टन ने सौन्दर्यशास्त्र को स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित किया तथा अन्य विचारकों ने इसे दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में स्वीकार किया।
षष्ठ अध्यायों में व्याख्यायित विषय में भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की तुलना पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र से की है जिसका मूल वेदों की ऋचाओं में हैं। डॉ. पूनम रानी ने मानव चिन्तन पूर्वक प्रस्तुत तुलनात्मक समालोचना में सौन्दर्यशास्त्र का स्वरूप एवं विकास पर प्रकाश डालते हुए सौन्दर्यशास्त्र और काव्यशास्त्र के विशेष भेद को उद्घाटित किया है। सौन्दर्यशास्त्र के सिद्धान्त एवं भारतीय चिन्तन में उसकी अवधारणा से सम्बन्धित विशेष सामग्री पाठकों को उपलब्ध करायी है।
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की पाश्चात्य सन्दर्भों में अन्य शास्त्रों से तुलना करते हुए सौन्दर्यशास्त्र को एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित करने का एक विशेष उल्लेखनीय कार्य लेखिका द्वारा किया गया है, अतः डॉ. पूनम रानी बधाई की पात्र है। यह उनका पीएच.डी. उपाधि का महनीय शोध प्रबन्ध पाठकों के समक्ष पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित है।