Description
प्रस्तुत ग्रन्थ जैमिनीय पूर्वमीमांसा दर्शन में ज्ञान के स्वरूप एवं ज्ञान की प्रक्रिया के अध्ययन पर केन्द्रित है। इस अध्ययन में पूर्वमीमांसा के भाट्ट एवं प्राभाकर सम्प्रदायों के सिद्धान्तों की अन्वीक्षा का प्रयास किया गया है। भाट्ट सिद्धान्तों के अनुशीलन हेतु पार्थसारथि मिश्र की शास्त्रदीपिका को तथा प्राभाकर सिद्धान्तों के अनुशीलन हेतु शालिकनाथ मिश्र की प्रकरणपञ्चिका को आधार-ग्रन्थ बनाया गया है।
चार अध्यायों में विभाजित इस ग्रन्थ में प्रथम अध्याय पूर्वमीमांसा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, आचार्य-परम्परा, शास्त्र-परम्परा व विषयवस्तु को संक्षिप्ततया निबन्धित करता है, द्वितीय अध्याय में ज्ञान के स्वरूप का विवेचन किया गया है, तृतीय अध्याय में बोध-प्रक्रिया अर्थात् सम्वित्प्रकाशन के सिद्धान्तों की समालोचना की गयी है तथा चतुर्थ अध्याय में प्रामाण्यवाद व ख्यातिवाद से सम्बन्धित पूर्वमीमांसाभिमत सिद्धान्तों का समालोचन किया गया है। भारतीय दार्शनिक परम्परा में विभिन्न दर्शन-प्रस्थानों के मध्य परस्पर संवाद की पद्धति दृष्टिगोचर होती है। प्रत्येक दर्शन-प्रस्थान अपने-अपने देशिक व कालिक सन्दर्भों एवं परिस्थितियों की अपेक्षा से अपने सिद्धान्तों की स्थापना व उनका विकास-परिष्कारादि करता है।
तत्कालीन व तद्देशीय धारणाओं तथा अन्य दार्शनिक पक्ष-प्रतिपक्षों का किसी भी दार्शनिक विचारधारा पर प्रभाव पड़ना सर्वथा स्वाभाविक है। अतः किसी भी दार्शनिक सिद्धान्त को उसकी सम्पूर्णता में समझने के लिये विभिन्न दर्शनों में उस सिद्धान्त के विषय में की गयी चर्चाओं व अन्तर्संवादों का निरीक्षण सहायक सिद्ध होता है। इसी प्रयोजन से यहाँ अद्वैत-वेदान्त, न्याय व बौद्ध विज्ञानवाद में प्रतिपादित ज्ञान के स्वरूप व प्रक्रियाविषयक सिद्धान्तों का भी संक्षिप्त उपस्थापन किया गया है।