प्रस्तुत कृति श्रीमद्भगवद्गीता एवं पातंजल योग दर्शन में विभिन्न विषयों का तुलनात्मक तथा आलोचनात्मक विवेचन नवीन सामग्री सहित स्पष्ट एवं सरल भाषा में किया गया है।
इस ग्रंथ में दार्शनिक विकास के विविध स्तर- प्रकृति, पुरुष, ईश्वर, पुरुष विशेष एवं मोक्ष की व्याख्या विस्तृत रूप से की गई है। गीता के कर्म योग, भक्ति योग एवं ज्ञान योग पर सम्यक रूप से प्रकाश डाला गया है। पातंजल योग सूत्र के अभ्यास, वैराग्य, क्रिया योग एवं अष्टांग योग की विस्तृत व्याख्या की गई है। इस प्रकार यह रचना दर्शन विषयक रचना की श्रृंखला के अंतर्गत एक उपयोगी कड़ी है।