Description
आप सभी पाठकों के सामने 'हठप्रदीपिका' के दूसरे संस्करण को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता की अनुभूति कर रहा हूँ। इस लेखन कार्य की सफलता के लिए मैं सबसे पहले दयालु परमात्मा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिनकी पावन प्रेरणा व अनुपम कृपा से इस कार्य को सम्पन्न कर पाया हूँ।
जीवन के प्रथम गुरु अर्थात् माता पिता के लिए ईश्वर का धन्यवाद व्यक्त करता हैं कि मुझे ऐसे माँ बाप के घर जन्म मिला, जहाँ से मुझे विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष व कड़ी मेहनत करने का मनोबल मिला है। मुझमें इन गुणों को विकसित करने वाली प्रातः स्मरणीय माताश्री पूज्या रामरती देवी व पिताश्री पूज्य धारे सिंह को कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ। पिताजी के मार्गदर्शन से ही मुझे योग व आध्यात्मिक विषयों की पुस्तकें पड़ने का सौभाग्य मिला है। उन पुस्तकों को पढ़ने से ही मुझमें योग व अध्यात्म को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। बचपन की इस आदत का ही परिणाम है कि आज मैं योग के क्षेत्र में कार्यरत हूँ। इसका सबसे पहला श्रेय पिताजी को ही जाता है।
माँ के विषय में विद्वान कहते हैं कि 'माता निर्माता भवति' अर्थात् माँ ही बच्चे का निर्माण करती है। माँ जिस प्रकार के गुण अपनी सन्तान में डालती है। वही गुण जोवन पर्यन्त उस व्यक्ति के व्यक्तित्त्व को दर्शाते रहते हैं। ठीक यही मेरे साथ भी हुआ है। जीवन में संसाधनों के अभाव व विपरीत परिस्थितियों में भी कार्य को किस प्रकार मनोबल व निरन्तरता के साथ बिना रुके, बिना थके करना चाहिए। इसका प्रशिक्षण मुझे माताजी द्वारा उनके जोवन में किए गए संघर्षों से मिला है। माँ द्वारा किए गए संघर्षों को याद करने के बाद मैं अपने आप को अनुपात से रोक नहीं पाता हूँ। मेरे द्वारा किए गए सभी कार्यों के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से मेरी माँ की प्रेरणा शक्ति काम करती है। जिसके फलस्वरूप मैं किसी भी कार्य को सुगमता से पूर्ण कर पाता हूँ। मैं इस लेखन कार्य को माताजी के चरणों में समर्पित करते हुए परमात्मा से उनके अच्छे स्वास्थ्य व दीर्घायु होने की मंगल कामना करता हूँ।