Description
गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर की पी-एच.डी. उपाधि के लिए ऋग्वेद के निपात विषय पर 1981 में मात्र चौदह निश्चयार्थक शब्दों पर शोधकार्य पूरा करने के बाद, ऋक्सूक्त चन्द्रिका (1996) तथा बृहदृक्सूक्तचन्द्रिका (2001) दो सङ्कलनों के रूप में ऋग्वेद के मन्त्रों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की, जिनके अत्यधिक लोकप्रिय होने के बाद, कुछ विद्वान् मित्रों का विशेष आग्रह था कि ऋग्वेद के मन्त्रों के ऐसे सङ्कलन का भी लेखन किया जाए, जो विशेषरूप से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की परीक्षा में निर्धारित ऋग्वेद के मन्त्रों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत कर सके, किन्तु इसके लिए स्वरचिह्नयुक्त फोण्ट के उपलब्ध न हो पाने के कारण, यह कार्य नहीं हो पा रहा था, क्योंकि स्वरचिह्नों के बाद ही मन्त्रों का प्रयोग ठीक रहता है, उसके अभाव में कुछ अधूरा सा प्रतीत होता है।
ईश्वर की परम अनुकम्पा से यह कार्य अब पूरा हो गया है। इसलिए प्रस्तुत 'ऋक्सूक्तकलिका' तृतीय सङ्कलन के रूप में पूरा हो गया है, आरम्भ में इसमें ऋग्वेद के परीक्षोपयोगी 36 सूक्तों आदि का सङ्कलन किया गया था, किन्तु बाद में विस्तार अधिक होने से इसे तीन भागों में विभक्त कर दिया गया, उनमें से प्रथम भाग, सायण भाष्यानुसारी व्याख्या के साथ, आप सुधीजनों के कर कमलों में हैं। विद्यार्थियों की आवश्यकता को देखते हुए, हमने इस कृति के आरम्भमें विस्तृत भूमिका के अन्तर्गत ऋग्वेद के इतिहास से सम्बन्धित प्रश्नों को देते हुए, उनसे जुड़ी अनेकानेक जिज्ञासाओं का समाधान करने का विनम्र प्रयास किया है। पदपाठ की सुगमरीति इस कृति की भूमिका का 'हृदय' कहा जा सकता है।