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गीता-विमर्श

गीता-विमर्श

Publisher: Vidyanidhi Prakashan
Language: Sanskrit & Hindi
Total Pages: 128
Available in: Paperback
Regular price Rs. 127.50
Unit price per
Tax included.

Description

श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय साहित्य के उपजीव्य ग्रन्थरत्न महाभारत का सर्वाधिक च्द्ध अंश है, जिसे एक स्वतन्त्र ग्रन्थ का गौरव प्राप्त है। भारतीय दर्शन की आधारभूत प्रस्थानत्रयी में इसका विशेष स्थान है। समस्त वेदों का सारसर्वस्व गीता में नहित है। यह उपनिषदों का निष्कर्ष है। गीता उन्नत विचार, योग, ज्ञान, भक्ति और कके व्यावहारिक आदेशों से युक्त एक अद्वितीय ग्रन्थ है। माना जाता है कि समस्त सान्त्रों का सिरमौर तो एक ही शास्त्र है-श्रीमद्भगवद्गीता, जिसका अद्भुत गान देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ने किया है-

एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव। एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माण्येकं तस्य देवस्य सेवा ।।
वस्तुतः अर्जुन के माध्यम से श्रीकृष्ण ने यह उपदेश मानवमात्र को दिया है। गीता के द्वारा न केवल अर्जुन प्रत्युत प्रत्येक व्यक्ति की जीवन सम्बन्धी शङ्काओं और स्याओं का समाधान होता है।

उत्कृष्ट पद की प्राप्ति कराने वाला गीता का ज्ञानप्रधान उपदेश केवल भारतीय दशनिकों और विचारकों को ही प्रभावित नहीं करता है, अपितु यह पाश्चात्य दार्शनिकों को भी समान रूप से आकर्षित करता है। यही कारण है कि गीता के ज्ञान-प्रकाश से बीवन को आलोकित करने के लिए प्रबुद्ध वर्ग में इसका अध्ययन, मनन और अध्यापन चिरकाल से होता आ रहा है। जिज्ञासु चिन्तकों को भी गीता के श्लोकों का वास्तविक अर्थ कठिनता से समझ में आता है। प्रतिभाशाली आचार्यों और टीकाकारों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इस पर अनेक भाष्य और टीकाएं लिखी हैं। उपयोगिता और प्रासंगिकता के आधार पर कई विद्वानों द्वारा गीता के श्लोकों के कई नूतन अर्थ की निकाले जाते हैं। अर्थगौरव और विशेष प्रस्तुति-विधान इस ग्रन्थ की महिमा को और अधिक बढ़ा देते हैं।