Description
सागर जैसी विशाल द्वादशांगी का सार निर्मल ध्यान योग है। श्रावक और साधु के जो मूल गुण एवं उत्तरगुण हैं तथा जो बाह्य क्रियाएँ दर्शायी गई हैं, वे सब ध्यान योग को सिद्ध करने हेतु है।
ध्यान सिद्धि का क्रम इस प्रकार है। ध्यान सिद्धि का उद्देश्य मुक्ति होना चाहिये, ध्यान सिद्धि के लिये मन-प्रसाद चाहिये अर्थात् चित्त प्रसन्न होना चाहिये। चित्त प्रसन्नता, अहिंसा, सयंम और तप आदि विशुद्ध अनुष्ठानों को उल्लास पूर्वक आसेवन करने से सिद्धि कर सकते हैं।
साधना को शुरुआत चित्त की निर्मलता से होती है। चित्त की निर्मलता के बिना वास्तविक स्थिरता एवं तन्मयता आत्मसात् होती ही नहीं है। जिनागर्मी में दर्शाये हुए मोक्ष साधक प्रत्येक अनुष्ठानों की भावपूर्वक आराधना, सर्वप्रथम साधक के चित्त को निर्मल बनाती है, तद्वपरान्त उसके फलस्वरुप क्रमशः चित्त की स्थिरता होने पर परमात्मा में तन्मयता सिद्ध होती है।
अहिंसा धर्म के पालन से चित्त निर्मल बनता है संयम धर्म के पालन से चित्त स्थिर बनता है तपधर्म के पालन से चित्त आत्मस्वरुप में लीन बनता है।