Description
इस ग्रन्थ के सात अध्यायों में विभक्त प्रथम अध्याय में 'नाट्यशास्त्र' के उद्भव और विकास की भारतीय परम्परा पर प्रकाश डाला गया है। द्वितीय अध्याय 'नाट्य के प्रमुख तत्त्वों' की विवेचना से सम्बन्धित है। तृतीय अध्याय में ऋग्वेदीय संवादों का सम्पूर्ण वर्गीकरण एवं मौलिक विवेचन प्रस्तुत करने की लेखिका ने चेष्टा की है। इसके अन्तर्गत यह सिद्ध किया है कि पाठ्य की दृष्टि से ऋग्वेद की नाटकीयता असंदिग्ध है।
चतुर्थ अध्याय यजुर्वेद में अभिनय के अन्तर्गत आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक अभिनय सोदाहरण निरूपित हैं। पञ्चम अध्याय "सामवेद में गीत" के अन्तर्गत गीत, नृत्य एवं वाद्य-यन्त्रों का उल्लेख किया गया है। षष्ठ अध्याय में अथर्ववेद में रसनिष्पत्ति प्रतिपादित है। इस प्रकार यह ग्रन्थ नाट्यशास्त्र के वैदिक आधार की विस्तृत विवेचना से सम्पन्न है।