Description
डॉ. मनीषा वाकडे हिरेखण ने अश्रान्त परिश्रम और सारग्रहिणी दृष्टि के साथ "बौद्ध निकायों का इतिहास" ग्रन्थ का प्रणयन की है, जो सर्वथा श्लाघ्य एवं स्पृहणीय है। पालि-त्रिपिटक का सुत्त-पिटक महत्त्वपूर्ण भाग है। भगवान् बुद्ध को धर्म का परिचय कराना ही सुत्त-पिटक का उद्देश्य है। सुत्त-पिटक का विषय भगवान् बुद्ध के उद्देश्य का उपदेश है। सुत्तों के सम्बन्ध में कोई नियम दृष्टिगोचर नहीं होता है। उनमें कई बहुत छोटे भी हैं और कई बहुत बड़े भी हैं। प्रायः प्रत्येक सुत्त के आरम्भ में उसकी एक ऐतिहासिक भूमिका रहती है। यह भूमिका हमें बतला देती है कि जिस उपदेश का विवरण दिया जा रहा है, वह भगवान् बुद्ध के द्वारा दिया गया है। भगवान् बुद्ध के उपदेश करने का ढंग सुत्तों में स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
पहले भगवान् बुद्ध दान, शील, सदाचार-प्रशंसा, दुराचार-निन्दा आदि सम्बन्धी साधारण प्रवचन देते थे। उसके बाद बुद्धों को ऊपर उठाने वाली आदेशना आरम्भ होती है। जिसमें चार आर्य-सत्यों आदि का उपदेश देते थे। दीघ-निकाय के अम्बट्ठ-सुत्त, कूटदन्त-सुत्त आदि में इसी तरह के उपदेश का विधान किया गया है। संयुत्त-निकाय के सळायतन-संयुत्त में चक्षुरादि इन्द्रियों उनके विषयों और विज्ञानों आदि को लेकर विस्तृत पुनरुक्तियाँ की गई हैं। अतः पुनरुक्तियों की अतिशयता सुत्तों की शैली की एक प्रधान विशेषता है। अंगुत्तर-निकाय संख्यात्मक प्रणाली पर संकलित किया गया है। अन्य निकायों में चार आर्य-सत्य, पाँच नीवरण, 32 महापुरुष-लक्षण, 62 मिथ्या दृष्टियों तथा 37 बोधिपक्षीय धर्मों आदि के संख्यात्मक निरूपण भरे पड़े हैं। दीघ-निकाय और मज्झिम निकाय के हिन्दी अनुवाद में महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने इन निकायों में आई हुई उपमाओं की सूची दी है।