Description
भारतीय संस्कृत परम्परा में धर्म एवं दर्शन ने मानव जीवन के विविध पक्षों को प्रभावित किया है। वैदिक साहित्य में प्राप्त तथ्यों के आधार पर ज्ञात होता है कि भारतीय ऋषि-मुनि धार्मिक और दार्शनिक भावना से भलीभांति अवगत थे। उन्होंने धर्म और दर्शन का गहन एवं सूक्ष्म विवेचन कर, उनके मूल सिद्धान्तों को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया। अतएव सर्वप्रथम वैदिक मंत्रों से इनका उद्गम माना जा सकता है। तत्पश्चात् ब्राह्मण साहित्य में उनका विधिवत् संकलन किया गया, उपनिषदों ने उनको तार्किक और दार्शनिक रूप दिया तथा धर्मसूत्र, स्मृति-ग्रन्थों, महाकाव्य एवं गीता आदि ने उनकी युक्तिसंगत एवं सहज व्याख्या प्रस्तुत की।
इस प्रकार कालक्रम में उनसे सम्बन्धित तत्त्व समाहित होते गये तथा उनके समन्वित स्वरूप से धर्म-दर्शन को एक व्यापक रूप मिला। धर्म, आचार और दर्शन सांस्कृतिक जीवन के मेरुदण्ड हैं। धर्म जीवन के उच्च आदर्शों एवं आचरणों का शुद्ध स्वरूप है। आचार नैतिक जीवन के विकास का आधार है। दर्शन क्रियात्मक व व्यवहारिक रूप का सम्यक् बोध कराता है।
ये धर्म-दर्शन आस्था और विश्वास के माध्यम से धार्मिक सहिष्णुता, समन्वयवादिता, सर्वाङ्गीणता, निरन्तरता, चिरस्थायीत्व और सार्वभौमिकता आदि गुणों को जन सामान्य तक पहुँचाकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को जागृत करते हैं। मनुष्य को भौतिकता से दूर कर आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख करते हैं, उसके जीवन को व्यवस्थित और सुखी बनाते हैं।
'भारतीय संस्कृति : धर्म और दर्शन' इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय संस्कृति की धरोहर को संरक्षित करने का प्रयास किया गया है। इसके साथ ही विषय की गम्भीरता को दृष्टि में रखते हुए, प्राचीन वाङ्मय के सन्दर्भों को देते हुए विषय से सम्बन्धित मतों को रखने का यथासम्भव प्रयत्न किया गया है। यह पुस्तक स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, पाठकगणों व सभी चिन्तकों के लिए भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्त्वों, धर्म और दर्शन के स्वरूप को बताने एवं समझाने में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसी आशा है।