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योग

योग

आचार्य शंकर के सान्निध्य में
Publisher: Raghav Publication
Language: Hindi
Total Pages: 344
Available in: Paperback
Regular price Rs. 792.00
Unit price per
Tax included.

Description

शंकरं लोक शंकारं की उद्घोषणा के पश्चात यदि सुधि पाठाकों के मध्य प्रस्तुत पुस्तक की विषय वस्तु की चर्चा करें तो, इस पुस्तक के तीन प्रमुख उद्देश्य है – पहला और सबसे प्रमुख, आचार्य शंकर के अद्वैत चिन्तन में योग के तत्त्वों की स्थिति को स्पष्ट करना । दूसरा शांकर दर्शन के व्यावहारिक पक्ष को जन मन तक पहुँचाना, एवं तीसरा दर्शन समाज के परिप्रेक्ष्य में आचार्य शंकर के दर्शन और योग दर्शन के मध्य समन्वय सम्बन्धी समस्या का निराकरण करना। उक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रथम अध्याय में आचार्य शंकर के व्यक्तित्व का चित्रण किया गया हैं, जिसमें तथ्यात्मक रूप से आचार्य शंकर के जन्मकाल, जन्मस्थल व महासमाधि पर विशेष चिन्तन किया गया है, इसी क्रम में आचार्य शंकर की कृतियों का भी संक्षिप्त अवलोकन प्रस्तुत किया गया है। और अध्याय के अंत में विभिन्न योग साधनाओं पर भी एक विहंगम दृष्टि डालते हुए योग के संक्षिप्त परिचय के अंतर्गत कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि साधनाओं का सामान्य प्रस्तुतिकरण किया गया है, साथ ही नैतिक साधना व ईश्वर विचार तथा कैवल्य पर भी योग के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया गया किया गया है।

पुस्तक के द्वितीय अध्याय में द्वैत एवं अद्वैत चिन्तनों पर विचार साझा किये गए हैं, जिसके अन्तर्गत् भारतीय दर्शन की मुख्य दो शाखायें द्वैत और अद्वैत जो आदि काल से ही समानान्तर अग्रसर रही हैं, का संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण किया गया है। सैद्धान्तिक रूप में वैदिक काल से इन दोनों चिंतन धाराओं के मध्य वैचारिक मतभेद भी रहे हैं। वैदिक साहित्य के आलोचन मे भी इन दोनों विचारों की बडी भूमिका रही है। जहाँ अद्वैत के आचार्य उपनिषदों को सीधे तौर पर वेदान्त घोषित करते हैं, वहीं उपनिषदों का भी कुछ ऐसा ही मत है। तो द्वैत मत के प्रवर्तक आचार्य वैदिक साहित्य के विपुल उल्लेखों के आधार पर अपने मतों की विवेचना करते है। द्वैत मत के प्रमुख प्रतिपादक आचार्य मध्व वैदिक साहित्य के सन्दर्भ पर ही विष्णु को सभी देवों का आधार मानते हैं। उपनिषदों में द्वैतात्मकता तथा अद्वयोन्मुखता दोनों ही प्रवृत्तियों की बहुलता है, जिनमें परस्पर संघर्ष भी होता रहा है। एक ओर उपनिषदों का 'तत्त्वमसि' वाक्य समस्त सृष्टि सत्ता का आधारभूत तथ्य है। तो वहीं दूसरी ओर उपनिषदों में भेदपरक वाक्यों पर भी संवाद मिलता है। 

मध्व के द्वैत के अतिरिक्त उपनिषदों में सांख्य और योग सम्मत द्वैत विचार भी बहुतया प्रस्फुटित हैं। सांख्य और योग दर्शन समान तंत्र हैं, सांख्य प्रकृति और पुरुष की मदद से सृष्टि की व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस दर्शन में ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं समझी गयी, इसलिए सांख्य दर्शन निरीश्वरवादी कहा जाता है। ठीक इसके विपरीत योगदर्शन सांख्य के विकासवाद का समर्थन करते हुए भी ईश्वर की व्याख्या करता है। योगदर्शन का लक्ष्य चित्तवृत्ति निरोध है। इस कार्य में ईश्वर का आश्रय लेना नितांत आवश्यक है, इसलिए महर्षि पतंजलि ने ईश्वर भक्ति को योग के सहायक तत्त्वों में अन्यतम माना। योगदर्शन ईश्वर को व्यावहारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बताता है, यही कारण है, कि उन्होनें ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करना आवश्यक नहीं समझा। सांख्य और योग दर्शन द्वैतवाद के प्रतिपादक दर्शन हैं। प्रस्तुत अध्याय में इसी क्रम में योग और अद्वैत के अन्तर्सम्बन्ध पर चर्चा प्रस्तुत करते हुए यह विचार किया गया है, कि योगदर्शन को भले ही द्वैतप्रणाली के अन्तर्गत् माना जाता हो। परन्तु इसकी सर्वग्राह्यता के कारण सभी दार्शनिक प्रस्थान ज्ञान जनक योग सम्बन्धि प्रक्रियाओं के प्रसंग में योगदर्शन की मान्यताओं को यथा सम्भव स्वीकार करते है ।

पुस्तक के तृतीय अध्याय में आचार्य शंकर द्वारा ज्ञानयोग व कर्मयोग के सम्बन्ध में प्रस्तुत ज्ञानवलोकन को स्थान दिया गया है, जिसके अंतर्गत सर्वप्रथम आचार्य शंकर की ज्ञानयोग मीमांसा को विषय बनाया गया है, शंकर ज्ञान प्राप्ति के लिए साधन चतुष्टय के पालन का आदेश करते हैं, इन साधनों के अंर्तगत विवेक, वैराग्य, षट्समपत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान) तथा मुमुक्षुत्व आते हैं। वहीं आचार्य शंकर के द्वारा कर्मयोग सम्बन्धि मतों को भी इस अध्याय के अंतर्गत पाउकों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है. शंकर के अनुसार ज्ञान रूप अग्नि से सभी कर्मफल नष्ट हो जाते हैं।