Description
तारार्णव के अनुसार वशिष्ठ ऋषि ने बहुत समय तक इस विद्या की उपासना की, किन्तु उन्हें सिद्धि नहीं मिली। परिणामतः वो क्रोधित होकर देवी को शाप दे दिया और तब से यह विद्या फल देने में अक्षम हो गयी।
तदपश्चात् शान्त होने पर ऋषि प्रवर ने देवी का शापोद्धार किया। शापोद्धार करते समय ताराबीज (त्री) में सकार का योग कर 'ॐ ह्रीं स्त्री हुँ फट्' इस विद्या (मन्त्र) से साधना करने का निर्देश दिया। तब से यह विद्या वधू के प्रमान यशस्विनी हो गयीं। तथा तारा का यह बीज (स्त्री) वधू बीज कहलाने लगा। नीलतन्त्र के अनुसार सप्रणव मायाबीज, वधू बीज, कूर्चबीज एवं अस्त्र वाला यह (ॐ ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्) पञ्चाक्षर दिव्य एवं अतिपवित्र है। यह विद्या साधकों को बुद्धि, ज्ञान, शक्ति, जय एवं श्री देने वाली तथा भय, मोह एवं अपमृत्यु का निवारण करने वाली मानी गयी हैं।
"नीलवर्णां त्रिनयनां शवासन समायुताम् । विभ्रतीं विविधां भूषामर्धेन्दुशेखरां वराम्" ।।
नीलादेवी दशमहाविद्याओं में अन्यतमा द्वितीया महाविद्या तारा देवी का ही रूपभेद मात्र है। प्रत्येक महाविद्या ही एक अखण्ड महाविद्या तत्त्व के विभिन्न प्रकाश हैं। वह्निः प्रकाश में रूप-विभिन्नता परिलक्षित होने पर भी मूलतः ये एक ही मातृकाशक्ति से प्रस्फुट होकर व्यापक रूप में हैं।
इससे यह स्पष्ट प्रतियमान होता है कि प्रयोजन भेद से एक ही महाशक्ति विभिन्न रूपों में आविर्भूता होकर विभिन्न मन्त्रों से पूजिता होती आ रहीं हैं। उपासना प्रयोग के विषय में काली, तारा, श्रीविद्या (शोडशी त्रिपुरसुन्दरी) भुवनेश्वरी प्रभृति की प्रकृति (शक्ति), विकृतिभाव (विकास एवं रूपान्तर) रहने पर भी ये सभी एक ही पराशक्ति की भिन्न-भिन्न विभूतियाँ हैं। इसके लिये उनकी महिमा भी तुल्यमूल्य है। अर्थात् अनुरूप एवं समान हैं- केवल रूपान्तर के कारण इनमें नाम भेद एवं मन्त्रभेद मात्र हैं।
विशेषतः कलयुग में नीलरूपा यह महाविद्या ही मानवों के लिये भोग एवं मुक्ति देने वाली है। श्रीनीलतन्त्र एक महातन्त्र है, जो सर्वोत्तम तन्त्र से श्रेष्ठत्तर तन्त्र है।