Description
कृतज्ञता सुमन
परम पूज्य माँ के मुखारविन्द से यह प्रार्थनायें मेरी माता जी, श्रीमती देवी वासवानी, की पुकार पर बह निकलीं।
बहुत सालों से मेरी माता जी पूज्य माँ के भक्तिपूर्ण प्रवाह द्वारा गीता, उपनिषद्, बाईबल के विस्तार का श्रवण कर रही थीं। बचपन से उन्होंने 'जपु जी' साहिब का पठन किया था। अब उन्होंने पूज्य से विनती की कि वे श्री जपु जी साहिब के आधार पर उनकी साधना में सहायता करें।
'जपु जी' साहिब के आधार पर परम पूज्य माँ के मुखारविन्द से प्रार्थनाओं का जो प्रवाह बह निकला, उसका श्रवण मेरी माता जी ने प्रेम विभोर होकर, भगवान के चरणों में बैठकर किया। निरन्तर श्रवण के फलस्वरूप उन्हें मनोशान्ति और आनन्द मिला। इस अनुभव के दर्शन से ऐसा प्रतीत होता है कि जो साधक इसी प्रकार हृदय में श्रद्धा रखकर अपनी 'मैं' भगवान के चरणों में चढ़ायेगा, वह वही प्रसाद पायेगा।
अपनी माँ के शान्तिपूर्ण दर्शन प्राप्त करके मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जो इस प्रवाह को प्रेम विभोर होकर धारण करता है, वह जीवन में आनन्द प्राप्त कर सकता है। अगर हम शब्दों में रुक गये तो शुष्क ही रह जायेंगे। वास्तव में इस प्रसाद को ग्रहण करने का रहस्य यही है कि इसे केवल समझने का प्रयत्न नहीं किया गया, बकि ज्यों का त्यों चरणों में धर दिया है। सो इसे ज्ञान विज्ञान सहित ग्रहण करके हृदय में धारण करने की बात है। इस में इतनी ही प्रार्थना है, 'हे मालिक ! मेरे हृदय में वास करो'।
मेरी माता जी को अहसास हुआ कि 'जपु जी' साहिब वही परम तत्व दर्शाते हैं जो पूर्व काल से प्रमाणित हुए सारे उपनिषद् तथा अन्य शास्त्र! इसमें मेरे माता जी को अपने आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान मिल गया और साथ में मन की शान्ति भी। उनके जीवन में भी बड़ा परिवर्तन हुआ। हमारे लिए भी यह श्रद्धाप्रद बन गई। अपने सौभाग्य को देखकर मैं कृतज्ञता पूर्ण हृदय से इस दिव्य प्रवाह को भक्तों के चरणों में समर्पित करती हूँ।
कुसुम भोजवानी